शिव-विवाह- कब नारी सती कहलाती है और कब पार्वती

पिता दक्ष द्वारा महादेव की उपेक्षा से अग्नि-स्नान करने वाली सती ही पार्वती हुई और उन्हीं माता के महादेव से विवाह का पर्व है शिवरात्रि ।
    आशय~ नारी विवाह के पूर्व और विवाह तथा उसके कुछ दिनों बाद यानि माँ बनने तक शरीर के स्तर पर जब जीवन जीती है एवं शारीरिक सौंदर्य, अलंकार-आभूषण को प्राथमिकता देती है तब वह सती कहलाती है ।
बाद में पार्वती हो जाती है----
    पर माँ बनते ही वात्सल्य और प्रेम-स्नेह में वह प्रवृत्त हो जाती है । शारीरिक सौंदर्य को छोड़कर जब सन्तान के प्रेम के वशीभूत हो जाती है तब उसका रूप पार्वती का हो जाता है ।
कौशल्या राम को और यशोदा कृष्ण को गोद में लिए हैं । प्यार-दुलार कर रही हैं । उनका श्रृंगार बिगड़ जाता है तो भी उसकी चिंता न कौशल्या को होती है और न यशोदा को । सन्तान-प्रेम में मां कुछ भी त्याग कर देती है । यही है माता पार्वती का स्वरूप ।
     यानि मानसिक प्रवृतियों का परिवर्तन । इस परिवर्तन से पति-पत्नी के लगाव में वृद्धि होती है । इसी वृद्धि का पर्व है शिवरात्रि ।
                    ~©सलिल पाण्डेय, मिर्जापुर ।

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