रजनीकांत अवस्थी
रायबरेली: जिला अस्पताल में प्राइवेट एंबुलेंस चालकों का एक साम्राज्य कायम है। जिन्होंने बेरोजगारी के दौर में सेवा के नाम पर मरीजों को ठगने का काम शुरू कर दिया है। तमाम प्राइवेट एंबुलेंस चालक लखनऊ के निजी चिकित्सालय में अपना संबंध स्थापित कर चुके हैं और मरीजों को निजी चिकित्सालय में ले जाने में भी कोई कोताही नहीं छोड़ते हैं।
आपको बता दें कि, जिला अस्पताल में कौन सा मरीज मरने वाला है और कौन सा मरीज यहां से रेफर होकर लखनऊ जाएगा इसकी पूरी जानकारी चालकों के पास अस्पताल के बाहर बैठे बैठे मिल जाती है। यही नहीं इन लोगों का मरीजों को ठगने का षड्यंत्र भी बड़ा ही विचित्र होता है। मरीज के परिजनों को जैसे ही निजी एंबुलेंस की खोज होती है। संगठन के एक-दो चालक मौके पर पहुंचते हैं और ऊची बोली लगाकर मोल भाव तय करते हैं परंतु जिस चालक का नंबर एम्बुलेंस ले जाने को होता है वहां झुंड के साथ आता है और उनका सरगना कम दामों में मरीज को ले जाना अपनी सेवा भाव से करने की बात कहकर मामला तय कर देता है।
अब आपको यह भी बताते चलें कि, इस एंबुलेंस में ना तो ऑक्सीजन की पर्याप्त व्यवस्था होती है और ना ही कोई कुशल चिकित्सक पद्धति को जानने वाला है सवार होता है। इस एंबुलेंस में एक चालक एक उसका मित्र एक मरीज और दो अन्य लोगों के साथ यह वाहन निकल पड़ता है और इसी के साथ उनका संगठन दूसरे मरीज की तलाश में जुट जाता है। यह सब तब है जब जिला अस्पताल में जब सरकार द्वारा 102 और 108 एंबुलेंस की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन एंबुलेंस सुविधा की लापरवाही के चलते इन तथाकथित एंबुलेंस चालकों की पौ बारह है। जो रोज मरीजो का आर्थिक शोषण करें।
रायबरेली: जिला अस्पताल में प्राइवेट एंबुलेंस चालकों का एक साम्राज्य कायम है। जिन्होंने बेरोजगारी के दौर में सेवा के नाम पर मरीजों को ठगने का काम शुरू कर दिया है। तमाम प्राइवेट एंबुलेंस चालक लखनऊ के निजी चिकित्सालय में अपना संबंध स्थापित कर चुके हैं और मरीजों को निजी चिकित्सालय में ले जाने में भी कोई कोताही नहीं छोड़ते हैं।
आपको बता दें कि, जिला अस्पताल में कौन सा मरीज मरने वाला है और कौन सा मरीज यहां से रेफर होकर लखनऊ जाएगा इसकी पूरी जानकारी चालकों के पास अस्पताल के बाहर बैठे बैठे मिल जाती है। यही नहीं इन लोगों का मरीजों को ठगने का षड्यंत्र भी बड़ा ही विचित्र होता है। मरीज के परिजनों को जैसे ही निजी एंबुलेंस की खोज होती है। संगठन के एक-दो चालक मौके पर पहुंचते हैं और ऊची बोली लगाकर मोल भाव तय करते हैं परंतु जिस चालक का नंबर एम्बुलेंस ले जाने को होता है वहां झुंड के साथ आता है और उनका सरगना कम दामों में मरीज को ले जाना अपनी सेवा भाव से करने की बात कहकर मामला तय कर देता है।
अब आपको यह भी बताते चलें कि, इस एंबुलेंस में ना तो ऑक्सीजन की पर्याप्त व्यवस्था होती है और ना ही कोई कुशल चिकित्सक पद्धति को जानने वाला है सवार होता है। इस एंबुलेंस में एक चालक एक उसका मित्र एक मरीज और दो अन्य लोगों के साथ यह वाहन निकल पड़ता है और इसी के साथ उनका संगठन दूसरे मरीज की तलाश में जुट जाता है। यह सब तब है जब जिला अस्पताल में जब सरकार द्वारा 102 और 108 एंबुलेंस की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन एंबुलेंस सुविधा की लापरवाही के चलते इन तथाकथित एंबुलेंस चालकों की पौ बारह है। जो रोज मरीजो का आर्थिक शोषण करें।

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