माहताब खान
रायबरेली: एदारा-ए-शरैया उ०प्र० खिन्नी तल्ला के संयोजन में जश्ने आमदे मुस्तफा का चौथा जलसा बाद नमाज इशा ताड़ तल्ला में अमीरे शरीयत उत्तर प्रदेश हजरत अल्लामा अलहाज पीर अब्दुल वदूद फकीह संस्थापक जुलूसे मोहम्मदी की सरपरस्ती में आयोजित हुआ। जलसे की अध्यक्षता मौलाना अरबी उल अशरफ नाजिमे आला एदारा ए शरैया एवं संचालन मौलाना नासिर खां अशरफी ने किया।
जलसे की शुरुआत हाफिज नूर मोहम्मद ने कुरान पाक की तिलावत से की। मोलवी मो०सुफियान व मोलवी सहाबुद्दीन ने नात शरीफ पेश की। मुख्य वक्ता मौलाना मो०मदनी-उल-अशरफ मिस्बाही ने अपनी तकरीर में कहा कि, मजहबे इस्लाम में एख्लाक का बहुत बड़ा किरदार है। आज आरोप लगाया जाता है कि, इस्लाम तलवार के जोर पर फैला है जबकि हकीकत यह है कि, इस्लाम का विस्तार सिर्फ और सिर्फ उसकी हक्कानियत, सदाचार, समानता, न्याय और नबी के सद्व्यवहार की बुनियाद पर हुआ है।
मौलाना ने कहा कि, पैगंबरे इस्लाम की पूरी जिंदगी नेकी और भलाई पर आधारित थी। आपने पूरी जिंदगी कभी किसी को तकलीफ़ नहीं दी। खुद अल्ल्लाह के पैगाम को लोगों तक पहुंचाने के लिए बेपनाह तकलीफ़ और अत्याचार का सामना करते रहे। उनकी सहनशीलता का ही नतीजा है कि, मक्का जैसा शहर जो सामाजिक बुराइयों का केन्द्र था वह आज दुनिया में एक पवित्र स्थल के रूप में परिवर्तित हो गया। मौलाना ने स्पष्ट किया शास्त्रों में इस्लाम के विस्तार का जो इतिहास दर्ज है उसमें किसी राजा रजवाड़े का इतिहास नहीं मिलता।
लाखों की संख्या में इस्लाम कुबूल करने की जो भी तारीख मिलती है उसमें ज्यादातर पीर फ़कीरों का ही योगदान दिखाई देता है। इस्लाम के यह प्रचारक पूरी जिन्दगी दुनियादारी से ऊपर उठकर सादगी भरे जीवन में नबी के बताए रास्तों पर अमल करते रहे और इंसानियत को ही प्राथमिकता पर रखा। मौलाना ने हदीस बयान करते हुए कहा कि, जो खुद खाओ वह अपने पड़ोसियों को भी खिलाओ। अगर उतना खाना नहीं है तो अपने बच्चों को घर में छुपा कर खिलाओ ताकि तुम्हारे पड़ोसी को तकलीफ़ न पहुंचे। मौलाना ने कहा कि, मुसलमानों को चाहिए की हम नबी के एख्लाक व किरदार पर अमल करते रहे ताकि इस्लाम की सच्ची तस्वीर जमाने पर जाहिर हो जाए। सलातो सलाम व मौलाना अरबी उल अशरफ की दुआ पर जलसे का समापन हुआ।
जलसे को सफल बनाने में मुख्य रूप से जक्न खां, नज्जन खां, अल्ताफ खां, जुग्गन खां, टोनी, महताब खां, साजिद खां, कल्लू, असलम, मुन्ना, सभासद इसरार अहमद का विशेष योगदान रहा।
रायबरेली: एदारा-ए-शरैया उ०प्र० खिन्नी तल्ला के संयोजन में जश्ने आमदे मुस्तफा का चौथा जलसा बाद नमाज इशा ताड़ तल्ला में अमीरे शरीयत उत्तर प्रदेश हजरत अल्लामा अलहाज पीर अब्दुल वदूद फकीह संस्थापक जुलूसे मोहम्मदी की सरपरस्ती में आयोजित हुआ। जलसे की अध्यक्षता मौलाना अरबी उल अशरफ नाजिमे आला एदारा ए शरैया एवं संचालन मौलाना नासिर खां अशरफी ने किया।
जलसे की शुरुआत हाफिज नूर मोहम्मद ने कुरान पाक की तिलावत से की। मोलवी मो०सुफियान व मोलवी सहाबुद्दीन ने नात शरीफ पेश की। मुख्य वक्ता मौलाना मो०मदनी-उल-अशरफ मिस्बाही ने अपनी तकरीर में कहा कि, मजहबे इस्लाम में एख्लाक का बहुत बड़ा किरदार है। आज आरोप लगाया जाता है कि, इस्लाम तलवार के जोर पर फैला है जबकि हकीकत यह है कि, इस्लाम का विस्तार सिर्फ और सिर्फ उसकी हक्कानियत, सदाचार, समानता, न्याय और नबी के सद्व्यवहार की बुनियाद पर हुआ है।
मौलाना ने कहा कि, पैगंबरे इस्लाम की पूरी जिंदगी नेकी और भलाई पर आधारित थी। आपने पूरी जिंदगी कभी किसी को तकलीफ़ नहीं दी। खुद अल्ल्लाह के पैगाम को लोगों तक पहुंचाने के लिए बेपनाह तकलीफ़ और अत्याचार का सामना करते रहे। उनकी सहनशीलता का ही नतीजा है कि, मक्का जैसा शहर जो सामाजिक बुराइयों का केन्द्र था वह आज दुनिया में एक पवित्र स्थल के रूप में परिवर्तित हो गया। मौलाना ने स्पष्ट किया शास्त्रों में इस्लाम के विस्तार का जो इतिहास दर्ज है उसमें किसी राजा रजवाड़े का इतिहास नहीं मिलता।
लाखों की संख्या में इस्लाम कुबूल करने की जो भी तारीख मिलती है उसमें ज्यादातर पीर फ़कीरों का ही योगदान दिखाई देता है। इस्लाम के यह प्रचारक पूरी जिन्दगी दुनियादारी से ऊपर उठकर सादगी भरे जीवन में नबी के बताए रास्तों पर अमल करते रहे और इंसानियत को ही प्राथमिकता पर रखा। मौलाना ने हदीस बयान करते हुए कहा कि, जो खुद खाओ वह अपने पड़ोसियों को भी खिलाओ। अगर उतना खाना नहीं है तो अपने बच्चों को घर में छुपा कर खिलाओ ताकि तुम्हारे पड़ोसी को तकलीफ़ न पहुंचे। मौलाना ने कहा कि, मुसलमानों को चाहिए की हम नबी के एख्लाक व किरदार पर अमल करते रहे ताकि इस्लाम की सच्ची तस्वीर जमाने पर जाहिर हो जाए। सलातो सलाम व मौलाना अरबी उल अशरफ की दुआ पर जलसे का समापन हुआ।
जलसे को सफल बनाने में मुख्य रूप से जक्न खां, नज्जन खां, अल्ताफ खां, जुग्गन खां, टोनी, महताब खां, साजिद खां, कल्लू, असलम, मुन्ना, सभासद इसरार अहमद का विशेष योगदान रहा।

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