तीसरी आखँ: सम्मान पाने के लिए देने और पाने वाले दोनों का अयोग्य होना जरूरी

सलिल पांडेय  (वरिष्ठ पत्रकार)   
मिर्जापुर: यहां-वहां, जहां-तहां सम्मान के बाजार सजे हैं। मंच-माइक-माला से सुशोभित मंच। मंच पर थोक भाव में बैठे भद्र-जन, जिनके कन्ठ अवरुद्ध होते जा रहे हैं कि, यदि उन्हें माइक पर बोलने के लिए कहा गया तो कोयल-कौए का भेद खुल जाएगा। तभी सम्मान का आढ़तियां तपाक से गजरा पहनाना शुरू करता है। पहनने वाले जान रहे है कि उनका क्यों सम्मान हो रहा है ? चूंकि उनके पास वर्तमान युग का AK-47 वाला धौंस रूपी ओहदा है, इसलिए वे आज कंच (कीचड़ का शार्ट फार्म) से मंच पर आ गए हैं।
दोनों का अयोग्य होना जरूरी!---
माइक पर संचालक बोलता है-'मैंने तो कहते थे, ये जो मंच पर बैठे लोग हैं, ये इतने महान है कि, मैंने तो फोन पर ही बुलाए थे कि, मौका मिले तो आ जाइएगा, आपका भी सम्मान कर कर दिए जाएंगे। मैंने तो जो समय दिए थे, उससे पहले ही ये आ गए।
    उक्त टूटे-फूटे वाक्य का जवाब देने के लिए थोक में आए सम्मानीय गण एक दूसरे का मुंह देखते हैं। अंत में कोई एक आता है और बोलता है।
सम्मान पाने वाला-'ये तो आपका महानता हैं, हम-सब किस काबिल, आपने सम्मान के लिए हमसब को चुनें। हमसब जिन्दगी भर आपका एहसान से दबा रहूंगा।
जैसे संचालक ने गलत-सलत वाक्यों में आमंत्रित किया, वैसा ही उद्बोधन रहा सम्मानित अतिथियों के प्रतिनिधि जी का।
तालियां बजी, नाश्ता-पानी से पहले सोशल मीडिया पट गया सम्मान समारोह के सिर्फ फोटो से।
    इसलिए आजकल सम्मान पाने के लिए अयोग्य (नाकाबिल), जोड़-तोड़ में माहिर, फर्जी ही सही धौंस बनाए रखने में निपुण, अंदर से खोखला ताकि यह न लगे कि, आपका क्यों सम्मान हो रहा है ? कहीं आपका सार्वजनिक मज़ाक तो नहीं बनाया जा रहा है ? इसी के साथ गुटबंदी में माहिर होना चाहिए। आप मुझे और मैं आपको सम्मान मंचों से देता रहूं, ऐसा गठबंधन भी होना चाहिए।
    खैर सम्मान पाने के कुछ और भी फंडे हैं जो इसी सब से मिलते जुलते ही हैं। समझ गए हों तो विस्तार देने से फायदा क्या ?

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ