आओ जाने सकट चौथ व्रत: 13 जनवरी व्रत महिमा विधि और पौराणिक कथा

सकट चौथ व्रत: माघ माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली चतुर्थी का विशेष महत्व माना गया है। इसे सकट चौथ, तिलकुटा चौथ संकटा चौथ, माघी चतुर्थी 
महत्व
इस व्रत को स्त्रियां अपनी संतान की लंबी उम्र और सुखी जीवन के लिए रखती हैं।
सकट चौथ व्रत विधि
इस व्रत को निर्जला रखा जाता है। व्रत रखने वालों को सुबह सूर्योदय पहले उठकर गुड़, तिल, गन्ने और मूली का प्रयोग करते हुए भगवान गणेश की पूजा करनी होती है। इस व्रत में भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसे पीले वस्त्र अर्पित किये जाते हैं। फिर पूरे दिन व्रत रखकर शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देकर ये व्रत पूरा किया जाता है। इस दिन पूजा के समय व्रत कथा को पढ़कर भगवान गणेश को गुड़ और तिल से बने लड्डू चढ़ाए जाते हैं।
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार था। वह मिट्टी के बर्तन बनाता, लेकिन वे कच्चे रह जाते थे। एक पुजारी की सलाह पर उसने इस समस्या को दूर करने के लिए एक छोटे बालक को मिट्टी के बर्तनों के साथ आंवा में डाल दिया।
उस दिन संकष्टी चतुर्थी का दिन था। उस बच्चे की मां अपने बेटे के लिए परेशान थी। उसने गणेश जी से बेटे की कुशलता की प्रार्थना की। दूसरे दिन जब कुम्हार ने सुबह उठकर देखा तो आंवा में उसके बर्तन तो पक गए थे।
लेकिन बच्चो का बाल बांका भी नहीं हुआ था। वह डर गया और राजा के दरबार में जाकर सारी घटना बताई। इसके बाद राजा ने उस बच्चे और उसकी मां को बुलवाया तो मां ने सभी तरह के विघ्न को दूर करने वाले संकष्टी चतुर्थी का वर्णन किया। इस घटना के बाद से महिलाएं संतान और परिवार के सौभाग्य के लिए सकट चौथ का व्रत करने लगीं।

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