गुप्त नवरात्र पर पण्डा समुदाय ने महामारी के नियंत्रण के लिए प्रार्थना की

विन्ध्याचल मंदिर पर 24 घण्टे का अखंड कीर्तन
मंदिर पर पंडा समाज के 21 सदस्य और श्रृंगारिया एवं उनकी 8 सदस्यीय टीम ही जा सकती है----
मिर्जापुर। मां विंध्यवासिनी के पवित्र धाम में वासन्तिक नवरात्र की तरह आषाढ़ माह के गुप्त नवरात्र की प्रतिपदा तिथि भी वीरानगी और खामोशी के बीच जय मां काली जय मां तारा दयामयी कल्याण करो की प्रार्थना के साथ शुरू हुई, वरना विशेष पर्वों पर शेरावाली की जय, मां विंध्यवासिनी की जय, बोलो विन्ध्याचल मइया की जय के उच्च स्वर से धाम गूंजता रहा है।
त्रिकोण की देवी माँ काली, मां तारा से प्रार्थना- 
गुप्त नवरात्र के प्रथम दिन सोमवार को त्रिकोण धाम में स्थित मां पार्वती स्वरूपा मां काली और तांत्रिक शक्ति देने वाली मां तारा से विंध्यपण्डा समाज के 21 सदस्यों की 4-4 की मंडलीने धाम के प्रांगण में सिद्धासन लगाकर मध्याह्न साढ़े 12 बजे से कीर्तन के माध्यम से महामारी से निजात के लिए देवी-शक्तियों से अनुनय-विनय किया । यह अखंड कीर्तन मंगलवार मध्याह्न तक चलेगा । रात्रि शयन आरती के बाद मंदिर का पट बंद हो जाएगा लेकिन आर्तनाद का कंठ खुला रहेगा । त्रिकोणधाम में स्थित मां काली दैत्यों का संहार करने वाली शक्ति हैं जबकि मां सरस्वती जड़ता के अन्धकार को दूर करती हैं और महालक्ष्मी स्वरुपा मां विंध्यवासिनी धन की देवी हैं। ये सकारात्मकता का धन और भौतिकधन प्रदान करती हैं । उर्ध्वमुखी मां काली वायुमंडल के जरिए दूषित विषाणुओं को उदरस्थ करती हैं ।
आम पण्डा भी दर्शन नहीं करेंगे-
 लॉकडाउन और विन्ध्याचल में हॉटस्पॉट को देखते मां के विग्रह से पर्दा तो हट गया लेकिन सबको दर्शन की छूट नहीं है। 21 सदस्य और श्रृंगारिया के साथ 8 लोग ही मंदिर पर जा सकते हैं ।
तन-मन-धन का बैंक- 
तीनों देवियों की आराधना का आशय तन-मन और धन की बेहतरी का प्रयास है। प्रकांड विद्वान, यशस्वी पत्रकार रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे स्व कमलापति त्रिपाठी देश-विदेश कहीं रहते थे नवरात्र की अष्टमी को मां के धाम में हाजिरी जरूर लगाते थे। उनके दर्शन का क्रम कंतित स्थित लालभैरव से दर्शन की अनुमति लेने के बाद शुरू होता था। वे पहले कालीखोह में उत्तम स्वास्थ्य के लिए मां महाकाली का, उसके पश्चात बौद्धिक क्षमता वृद्धि के लिए सरस्वती स्वरुपा अष्टभुजा देवी का और अंत में उच्च चिंतन को ही धन मानकर लक्ष्मी स्वरुपा मां विंध्यवासिनी का दर्शन करते रहे। 
निष्काम भक्तों की आकांक्षा-
 इस वर्ग के लोग ज्ञान, इच्छा और क्रिया का त्रिकोण इस धाम को मानते है। उनका कहना है कि जागतिक पदार्थों ( भौतिक) के लिए पहले तो माँ विंध्यवासिनी का दर्शन करना चाहिए । इसके बाद इस इच्छा को लेकर मां काली का दर्शन करना चाहिए। यहां के बाद सरस्वती स्वरुपा अष्टभुजा देवी के पास जाकर विवेक-रूपी धन की कामना करनी चाहिए । इन तीनों देवियों के दर्शन से इतनी अधिक वैचारिक शुद्धता प्राप्त हो जाएगी कि वाह्य जगत छोटा लगने लगेगा और अंतर्जगत में मां विंध्यवासिनी प्रकट हो जाती हैं। इस प्रकटीकरण से विशिष्टता का बोध होने लगेगा । इस स्थिति में पुनः मां विंध्यवासिनी मंदिर पर आकर आभार प्रकट करना चाहिए । तभी त्रिकोण बन पाएगा।
तीन त्रिकोण-
 विंध्यक्षेत्र में वृहद, मध्यम और लघु तीन त्रिकोण का उल्लेख मिलता है। वृहद में धाम से लगभग 5 कोस पूर्व दिशा में बरियाघाट में तारकेश्वर महादेव के दर्शनपूजन से शुरू होता है। इसमें तीन दिन में यात्रा का विधान है। ओझला के पास पुण्योधा नदी का स्नान, लोहदी महावीर के दर्शन आदि का विधान है। फिर विन्ध्याचल में हाजिरी, यहां संकटमोचन मंदिर आदि विविध मंदिरों के पूजन के बाद छानबे क्षेत्र में स्थित बदेवरनाथ मंदिर का दर्शन करना चाहिए । मध्यम त्रिकोण में मां विंध्यवासिनी, कालीखोह और अष्टभुजा देवियों के दर्शन का विधान है। जबकि लघु त्रिकोण में विंध्यवासिनी मंदिर पर ही तीनों देवियों के दर्शन का प्राविधान है।
सलिल पांडेय, प्रेमघनमार्ग (वृहद त्रिकोण के मध्य) मिर्जापुर।
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