¶¶ हे प्रभु देख तेरे संसार की क्या हालत हो रही।
¶¶ कोरोना महामारी से दुनिया वीरान हो रही।
¶¶ प्रकृति ये कैसा कोरोना का कहर ढाँ रही।
¶¶ अपनो को अपने से दूर भगा रही।
¶¶ जिस्मों से जाने जुदा हो रही।
¶¶ मौते अठखेलियाँ कर रही।
¶¶ गाजा पट्टी में बमों की आतिश मुंबई, गुजरात मे तूफान औ बारिस।
¶¶ हे प्रभु कैसी तेरी माया है।
¶¶ चारो तरफ मौत का ही साया है।
¶¶ इस तरह मानव की बेबसी न देखी।
¶¶ रोते बिलखते हुए भारत की तस्वीर न देखी ।
¶¶ हजारो घर उजडे, गाँव वीरान हो रहे।
¶¶ कोरोना महामारी से लोग हाल बेहाल हो रहे।
¶¶ ये कैसा प्रकृति रूद्र रुप धारण कर रही।
¶¶ मानव को आखिर में चार कंधों के लिए तरसा रही।
¶¶ प्रकृति ये कैसा आभास करा रही।
¶¶ मानव को आक्सीजन के लिए तडपा रही ।
¶¶ हर चीज़ की कीमत समय आने पर होती है।
¶¶ मुफ्त मे मिली आक्सीजन अस्पतालों मे दुर्लभ होती है।
¶¶ हे प्रभु तेरे फैसले पर "मै" शक कैसे करू।
¶¶ अगर सजा दे रहे हो तो कुछ तो गुनाह रहा होगा।
¶¶ हे प्रभु ये कैसा समय का चक्र चला रहे ।
¶¶ एयरकंडीशन मे सोने वालो को गंगा की रेत में सुला रहे।
¶¶ ऐ मौत तेरे फैसले भी नेक है।
¶¶ शमसान में हर गरीब और अमीर का बिस्तर भी एक है।
¶¶ प्रकृति मानव कर्मो की कभी अनदेखी नही करती।
¶¶ समय आने पर सजा देने में कभी देरी नही करती।
¶¶ कर्म की गठरी लादि के, जग फिरे इंसान।
¶¶ जैसा करे, वैसा भरे, विधि का यही विधान।
¶¶ कर्म करे, किस्मत बने, जीवन का ये मर्म।
¶¶ प्राणी तेरे भाग्य मे, तेरे अपने कर्म।
पुष्पा रावत महराजगंज जिला रायबरेली/उत्तर प्रदेश


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