संस्कारों से परिपूर्ण मनुष्य जीवन में कोरोना के भय से अंतिम संस्कार से कतराते लोग और गंगा नदी में तैरते मिले शवों पर विशेष-

                        [सुप्रभात-सम्पादकीय]

साथियों! कहते हैं कि, मनुष्य जीवन संस्कारों से परिपूर्ण होता है, जो पैदा होने के बाद शुरू होता है और अंतिम सांस तक ही बल्कि मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार के साथ समाप्त होता है।लोग कहते हैं कि, अंतिम संस्कार करना ईश्वरीय नेक कार्य होता है। इसीलिए लोग दुश्मन के भी अंतिम संस्कार में शामिल होकर श्रद्धाजलि अर्पित कर पुण्य के भागीदार बनते हैं। बहुत कम ऐसे अभागे लोग होते हैं, जिन्हें अंतिम संस्कार का सौभाग्य नहीं मिलता है, वरना मृत्यु के बाद लोग पागल गरीब लावारिस का भी अंतिम संस्कार कर देते हैं। 

    इस समय कोरोना के दूसरे दौर में मृत्यु दर में अचानक   अप्रत्याशित वृद्धि हो गई है।कोरोना का ऐसा दहशत फैल गया कि, लोग उसके खौफ से मरने लगे हैं, और हार्टअटैक का दौर चल रहा है। मुसीबत की घड़ी में वह लोग अपने निकटतम परिजनों के शव को कोरोना हो जाने के भय से छूने से घबड़ा रहे हैं, और शव को अस्पताल में छोड़कर भाग जा रहे हैं। इससे और अधिक बुरा समय नही आयेगा कि, जो लोग अस्पताल का लाखों बकाया मृतक परिजन के शव को लेने के लिए भुगतान कर देते थे, वही आज कुछ लोग अपने परिजन के शव को भगवान के सहारे लावारिस छोड़कर चकमा देकर भाग आ रहे हैं, और अपने अंतिम संस्कार करने के दायित्व को भुला दिया है। शहरों में ऐसे लावारिस शवों का अंतिम संस्कार सरकार द्वारा कराया जा रहा है। अबतक कहीं से भी ऐसी सूचना नहीं मिली थी कि, लोगों के अंतिम संस्कार नही हो रहे हैं, और उन्हें नदियों में फेंका जा रहा है। लेकिन दो दिन पहले उत्तर प्रदेश एवं बिहार की सीमा पर गंगा नदी में बलिया बक्सर के आसपास सैकड़ों शव लावारिस पड़े मिले हैं। इन लावारिस शवों के मिलने के बाद हड़कंप मच गया है, और मीडिया में तरह तरह की टिप्पणियां एवं आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं।

    शवों के मिलने के बाद ग्रामीण क्षेत्र में कारोना के प्रवेश करने की आशंका बढ़ गई है, और समझा जाने लगा है कि, कोरोना ने गाँवों में पैर पसार कर मौत का तांडव शुरू कर दिया है। यह सही है कि, इधर पिछले दो महीने से सर्द गर्म बदलते मौसम के चलते लोगों को वायरल, टाइफाइड, सर्दी खांसी दर्द ने परेशान कर रखा है।। इसनोफीलिया के मरीजों को सांस की दिक्कत होने लगी है, और लोगों की जान बचाने के लिए आक्सीजन की हायतौबा मची है।  मुसीबत के इस दौर में दुनिया भर से आक्सीजन गैस व अन्य जीवनरक्षक दवाएं उपकरण आदि मदद के रूप में हमारे देश को भेज रहे हैं। इस मौसमी प्रकोप ने हर एक पीड़ित का दिल दहला दिया है, और वातावरण अनुकूल पाकर इसी बीच कोरोना को अटैक करने का मौका मिल गया है। यह कटुसत्य है कि, इधर गाँवों में बड़ी संख्या में मौतें हुयी, लेकिन यह कहना संभव नहीं है कि, इनमें कितनी मौतें कोरोना से और कितनी अन्य कारणों से हुयी है। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि, लोग हर मौत को कोरोना से जोड़कर अंतिम संस्कार में शामिल होने तक से कतराने लगे हैं, और जिसके घर में कंधा देने वाला नही है उसे जानवरों की तरह ठेलिया या रिक्शा में ले जाकर अपने परिजन को लादकर शमसान तक ले जाकर उन्हें जलाना या दफनाना पड़ रहा है।यह भी कटुसत्य है कि, ग्रामीण क्षेत्रों में भी कोरोना अपनी पैठ बनाने लगा है, क्योंकि तमाम लोग जांच में पाजटिव मिल चुके हैं, और यह सिलसिला अनवरत जारी है। 

    यही कारण है कि, सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों का सर्वे कराकर टेस्टिंग करने और दवाओं के किट वितरित करने के निर्देश दिये हैं, जिसका अनुपालन भी शुरू हो गया है। गाँव गाँव जाकर जांच के लिए टीमों का गठन कर दिया गया है, लेकिन निचले स्तर पर हो रही लापरवाही चिंता का विषय है। यह भी सही है कि, जहाँ लोग खुद कोविड केन्द्रों पर जाकर अपनी जांच करवा रहे हैं, वहीं एक बड़ी आबादी बुखार आदि आने के बावजूद जांच एवं वैक्सीन लगवाने से कतरा रहा है।यह सही है कि, अगर सरकार की मंशा के अनुरूप सर्वे करके लोगों की पहचान कर उनका इलाज कर दिया जाय, तो मुसीबत का अंत हो सकता है। अभी समय है कि, कोरोना से गाँवों को बचाया जा सकता है लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि, पिछली बार की तरह ही इस बार भी कोरोना कहर एवं बचाव में लगाये गए लाकडाउन की वजह से प्रवासी मजदूरों की वापसी का दौर शुरू हो गया है। पिछली बार तो बाहर से आने वालों की जांच एवं उन्हें कोरन्टाइन भी कराया जाता था, लेकिन इस बार बिना जांच पड़ताल कराये ही सीधे अपने घरों में पहुंच कर समाजिक सहभागिता कर रहे हैं। सभी जानते हैं कि, कोरोना के कुछ ही मरीज हैं जो ठीक नहीं हो पाते हैं अन्यथा आज भी संक्रमित अधिकांश लोग इलाज से ठीक हो जा रहे हैं। गाँवों में यह स्थिति नहीं है कि लोगों को जलाया या दफनाया न जा रहा हो और बिना अंतिम संस्कार के नदी में फेंक दिया जाता हो। वैसे गंगा नदी के जल को प्रदूषित होने से बचाने के लिए अधजले या बिना जले शवों के विसर्जन पर पहले से ही रोक लगी है, और प्रति लोगों को जागरूक करने के निर्देश दिये जा चुके हैं, इसके बावजूद सैकड़ों की संख्या में गंगा नदी में शव का तैरते मिलना चिंता का विषय है।

    यह शव किसके है और इन्हें कहां पर तथा किसने फेंका इसका राजफाश होना जरूरी है। हालांकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले को संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश एवं बिहार के मुख्य सचिवों के साथ ही केन्द्रीय जलशक्ति मंत्रालय के सचिव को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में कार्यवाही रिपोर्ट तलब की है। इस सम्बंध में एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में भी दाखिल की गई है, जिसमें गंगा नदी में तैरते मिले शवों की जांच कराने की मांग की गई है।

धन्यवाद।।सुप्रभात/वंदेमातरम/गुडमार्निंग/नमस्कार/अदाब/शुभकामनाएं।। ऊँ भूर्भुव स्वः----/ऊँ नमः शिवाय।।। 

          भोलानाथ मिश्र वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी

                  रामसनेहीघाट, बाराबंकी यूपी।

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