रजनीकांत अवस्थी
लखनऊ: UPPCL में पीएफ के अरबो रूपये के घोटाले पर जहाँ एक ओर विद्युतकर्मी आंदोलनरत है तो वहीं दूसरी ओर सरकार मानो दोनो कानो में तेल डालकर ऊपर से रुई लगाकर सोई हुई है और खामोशी से गांधीवादी आन्दोलन को नजर अंदाज करके उसके उग्र होने का इन्जार कर रही है।
आपको बता दें कि, आश्चर्य इस बात का है कि, सरकार द्वारा जिस जाँच एजेन्सी को इस घोटाले की जिम्मेदारी सौपी है। वह जाँच एजेन्सी इस घोटाले के मुख्य आरोपियों पर हाथ डालने से डरती नजर आ रही है। वैसे एक बात और समझ में नही आ रही है कि, जब प्रदेश का DGP ही प्रमुख सचिव गृह के आधीन होता है और इस पद पर एक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सेवा रत है तो, क्या वो अपने साथी जो कि, अध्यक्ष के तौर पर वहाँ अवैध रूप से सिर्फ़ और सिर्फ़ भ्रष्टाचार करने के लिए ही नियम विरुद्ध नियुक्त किए गये थे ऐसा नहीं है कि, यह पहली नियुक्त है वरन ऐसा सन् 2000 से निरन्तर होता आ रहा है की अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक चाहे वो पावर कारपोरेशन का हो या डिस्काम के या अन्य किसी भी कम्पनी यानी uppcl से सम्बंधित है। उसमें नियुक्ति नियमो को दर किनार करना होता ही चला आ रही है।
तब क्या ऐसा हो सकता है कि, सब कुछ जानने वाले प्रमुख सचिव गृह जो कि, पूर्व में प्रबंध निदेशक पावर कारपोरेशन भी रहे है वो, आपने किसी भी साथी को इस घोटाले में फसने देगे।
पाठको को यह जान कर हैरानी होगी कि, प्रमुख सचिव गृह के कार्यकाल में एक बडा घोटाला हुआ था जिसकी जाँच विजलन्स के पास है और फाइल गृह गोपन विभाग में या प्रमुख सचिव गृह अपनी ही जाच अपने ही मातहतों द्वारा करा रहे है। है ना हास्यास्पद बात हम पाठको को याद दिलाता चाहते है कि, इन महाशय को ग्रिड फेल हो जाने के कारण या कहे राजनीति के शिकार कर के पद से हटकर अभियन्ता एपी मिश्र की नियुक्ती पिछली सरकार मे हुई थी। क्या ऐसे अधिकारी के आधीन जाच निष्पक्ष हो पायेगी।
यह एक यक्ष प्रश्न है और दूसरी ओर जबकि, अपने खून पसीने की कमाई के घोटाले पर पूरे प्रदेश के विद्युतकर्मी खुलेआम अपने पूर्व प्रबन्धन एवं ट्रस्ट के अध्यक्ष की गिरफ्तारी की मांग करते प्रदेश की सड़को पर आदोलन करते नजर आ रहे है। परन्तु प्रदेश सरकार जीरो टालरेंस का दावा करने वाली 2017 और 2018 तक में करोड़ो के कमीशनखोरी के चक्कर में कर्मचारियो के अरबों रुपये के मास्टर माइंड प्लानर को पकड़ने के बजाय उसके बचाव में उल्टेसीधे बयान बाजी कर रही है।
जो सरकार की करनी और कथनी के अंतर को दर्शाता है यह संकेत कर्मचारियों के आंदोलन की आग में घी डालने जैसे हालात पैदा हो गये हैं। RBI द्वारा DHLF का बोर्ड भंग कर दिया गया। इधर कर्मचारी एवं कर्मचारी नेता जो आंदोलन की राह पर है उसे एक साथ प्रदेश सरकार और ब्यूरोक्रेट से अपने खून पसीने की कमाई की लूटी अरबो की धनराशि की गारंटी भी चाहिए और अपने विभाग में पल रहे जयचंद जो कि अभी भी सेवा में है और इस घोटाले में सरकारी गवाह बनाएँ जा रहे है। यानि कि आपस में होशियार भी रहना एक बड़ी चुनौती बन कर सामने खड़ी है। वैसे तो कर्मचारियों के हालात पर एक शेर याद आ रहा है। ना मांझी ना रहबर ना हक में हवाएं है, कश्ती भी जरजर यह कैसा सफर है।
लखनऊ: UPPCL में पीएफ के अरबो रूपये के घोटाले पर जहाँ एक ओर विद्युतकर्मी आंदोलनरत है तो वहीं दूसरी ओर सरकार मानो दोनो कानो में तेल डालकर ऊपर से रुई लगाकर सोई हुई है और खामोशी से गांधीवादी आन्दोलन को नजर अंदाज करके उसके उग्र होने का इन्जार कर रही है।
आपको बता दें कि, आश्चर्य इस बात का है कि, सरकार द्वारा जिस जाँच एजेन्सी को इस घोटाले की जिम्मेदारी सौपी है। वह जाँच एजेन्सी इस घोटाले के मुख्य आरोपियों पर हाथ डालने से डरती नजर आ रही है। वैसे एक बात और समझ में नही आ रही है कि, जब प्रदेश का DGP ही प्रमुख सचिव गृह के आधीन होता है और इस पद पर एक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सेवा रत है तो, क्या वो अपने साथी जो कि, अध्यक्ष के तौर पर वहाँ अवैध रूप से सिर्फ़ और सिर्फ़ भ्रष्टाचार करने के लिए ही नियम विरुद्ध नियुक्त किए गये थे ऐसा नहीं है कि, यह पहली नियुक्त है वरन ऐसा सन् 2000 से निरन्तर होता आ रहा है की अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक चाहे वो पावर कारपोरेशन का हो या डिस्काम के या अन्य किसी भी कम्पनी यानी uppcl से सम्बंधित है। उसमें नियुक्ति नियमो को दर किनार करना होता ही चला आ रही है।
तब क्या ऐसा हो सकता है कि, सब कुछ जानने वाले प्रमुख सचिव गृह जो कि, पूर्व में प्रबंध निदेशक पावर कारपोरेशन भी रहे है वो, आपने किसी भी साथी को इस घोटाले में फसने देगे।
पाठको को यह जान कर हैरानी होगी कि, प्रमुख सचिव गृह के कार्यकाल में एक बडा घोटाला हुआ था जिसकी जाँच विजलन्स के पास है और फाइल गृह गोपन विभाग में या प्रमुख सचिव गृह अपनी ही जाच अपने ही मातहतों द्वारा करा रहे है। है ना हास्यास्पद बात हम पाठको को याद दिलाता चाहते है कि, इन महाशय को ग्रिड फेल हो जाने के कारण या कहे राजनीति के शिकार कर के पद से हटकर अभियन्ता एपी मिश्र की नियुक्ती पिछली सरकार मे हुई थी। क्या ऐसे अधिकारी के आधीन जाच निष्पक्ष हो पायेगी।
यह एक यक्ष प्रश्न है और दूसरी ओर जबकि, अपने खून पसीने की कमाई के घोटाले पर पूरे प्रदेश के विद्युतकर्मी खुलेआम अपने पूर्व प्रबन्धन एवं ट्रस्ट के अध्यक्ष की गिरफ्तारी की मांग करते प्रदेश की सड़को पर आदोलन करते नजर आ रहे है। परन्तु प्रदेश सरकार जीरो टालरेंस का दावा करने वाली 2017 और 2018 तक में करोड़ो के कमीशनखोरी के चक्कर में कर्मचारियो के अरबों रुपये के मास्टर माइंड प्लानर को पकड़ने के बजाय उसके बचाव में उल्टेसीधे बयान बाजी कर रही है।
जो सरकार की करनी और कथनी के अंतर को दर्शाता है यह संकेत कर्मचारियों के आंदोलन की आग में घी डालने जैसे हालात पैदा हो गये हैं। RBI द्वारा DHLF का बोर्ड भंग कर दिया गया। इधर कर्मचारी एवं कर्मचारी नेता जो आंदोलन की राह पर है उसे एक साथ प्रदेश सरकार और ब्यूरोक्रेट से अपने खून पसीने की कमाई की लूटी अरबो की धनराशि की गारंटी भी चाहिए और अपने विभाग में पल रहे जयचंद जो कि अभी भी सेवा में है और इस घोटाले में सरकारी गवाह बनाएँ जा रहे है। यानि कि आपस में होशियार भी रहना एक बड़ी चुनौती बन कर सामने खड़ी है। वैसे तो कर्मचारियों के हालात पर एक शेर याद आ रहा है। ना मांझी ना रहबर ना हक में हवाएं है, कश्ती भी जरजर यह कैसा सफर है।

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