चिमनियां से निकलने वाला धुंआ व कोयले की राख से अपँग हो रहे रायबरेली की इस फैक्ट्री के आस-पास रहने वाले लोग।। Raebareli news ।।

उपजाऊ जमीन को बंजर बना रही एनटीपीसी से निकलने वाली राख
रजनीकान्त अवस्थी
रायबरेली: देश में बिजली बनाने के लिए सबसे ज्यादा प्रयोग कोयले का होता है। इसके अलावा पानी व अन्य विधियों से भी बिजली का निर्माण होता है। देश में कोयले से चलने वाले बिजली घरों की संख्या सबसे ज्यादा है और यहीं पर सबसे ज्यादा अपशिष्ट भी उत्सर्जित होता है। जिसमें काली राख की अधिकता होती है। जिसका अभी तक कोई समुचित उपयोग नहीं किया जा रहा है। यही कारण है कि बिजली घर के आस-पास भी बड़ी मात्रा में काली राख पड़ी रहती है। 
     आपको बता दें कि, जनपद में ऊंचाहार एनटीपीसी भी इससे अछूता नहीं है। जहाँ यह पर्यावरण को ही प्रदूषित नहीं करती वरन जल के साथ साथ मानव जाति को भी प्रभावित करती है। कोयले से चलने वाली एनटीपीसी बिजली घर से निकलने वाले अपशिष्ठ को ठिकाने लगाने की शायद कोई योजना संबंधितो के पास नहीं है, वरना इसका कोई न कोई समुचित उपयोग हो रहा होता।
       विज्ञान ने भी हर क्षेत्र में अपने पांव पसारे, बेस्ट ऑफ द वेस्ट का प्रयोग किया। लेकिन कोयले के बिजली घर से निकलने वाले अपशिष्ट के समुचित उपयोग का अभी तक कोई तरीका ढूंढा नहीं गया है। ऐसा नहीं है कि, इसका कोई उपयोग नहीं होगा। इसका उपयोग है लेकिन सरकार व संबंधित शायद इस ओर ध्यान देना नहीं चाहते हैं। शायद इस दिशा में बेहतर उपयोग के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाए गए। इस दिशा में कोई कारगर कदम उठाया गया होता तो अब तक अपशिष्ट के प्रयोग का रास्ता निकल आया होता। 
      एनटीपीसी से निकलने वाली काली राख से क्षेत्र की भूमि बंजर होती जा रही है। काली राख का कोई समुचित उपयोग न होने के कारण आसपास की उपजाऊ भूमि भी इसके प्रभाव में आते ही बंजर होने लगी है। यही नहीं आंधी और तूफान आने पर यह  राख हवा के साथ मिलकर सांस, त्वचा तथा आंख के रोग उत्पन्न करती है। इसके संपर्क में लगातार काम करने वाले लोग असमय काल कलवित हो रहे हैं। तो क्या इस काली राख से इसके आसपास रहने वाले लोगों को कोई समस्या नहीं होती होगी? इस काली राख से जमीन और हवा के अलावा निकट के जल स्रोत ही नहीं तालाब कुएं नहर व नदी भी प्रदूषित होते जा रहे हैं।
       जानकारों के मुताबिक कोयले से निकलने वाला हर अपशिष्ट चाहे वह गैस हो या राख  मानव शरीर मस्तिष्क और मन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि, कोयले की राख से मानव जीवन पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता है, हवा में घुले जहर के कारण लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। कहने को तो प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण गाड़ियों से निकलने वाला धुआं कहा जाता है। लेकिन कोयले से निकलने वाले अपशिष्ट से ऊंचाहार की आबो हवा कितनी प्रभावित हो रही है। इस पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है।
       एनटीपीसी से उत्सर्जित होने वाली काली राख को लेकर कहीं कोई चिंतित नहीं दिखाई पड़ता नजर आ रहा है। आज इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है कि, एनटीपीसी में ईंधन के रूप में प्रयोग होने वाले कोयले व अपशिष्ट से होने वाले प्रदूषण पर ध्यान दिया जाए और इसका मुकम्मल रास्ता निकाला जाए। एनटीपीसी भले ही इसे बेकार मान रही हो और इस पर गौर न कर रही हो लेकिन इसका प्रयोग कोलतार की सड़क बनाने में बेहतर रूप से किया जा सकता है। यही नहीं जहां पहुंचने के साधन नहीं है, सड़के नहीं है, जहां की मिट्टी चलने लायक नहीं है वहां पर भी इनका प्रयोग किया जा सकता है। इसके अलावा गमलों में तथा गड्ढे पाटने में भी इसका उपयोग किया जा सकता है।

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