भेष से भिक्षा और भेष से ही रुतबा भी बनता है

ले कोट, ले पैंट और ले जूता भोजन करो !---
सब भेष का कमाल है । एक बोधकथा से वर्तमान दौर की सच्चाई हर किसी के इर्द-गिर्द दिखाई पड़ती मिल जाएगी ।
 बोधकथा-एकराजा ने अपने राज्य के महाकवि को पत्र भेजकर बुलवाया । महाकवि ठहरे निर्धन । सो सुदामा वाले भेषभूषा में 'न सिर पर है पगड़ी न तन पर है जामा...' हालत में पहुँचे । द्वारपालों से सब कुछ बताया महाकवि ने लेकिन द्वारपाल माने नहीं और उन्हें भगा दिया ।
    महाकवि ने इस वाकये की चर्चा अपने इलाके के लोगों से की। लोगों ने कहा-'राजा के यहां फटीचर बन कर जाएंगे तो यहीं होगा । अगर चाहते हैं कि अंदर प्रवेश मिले तो बन-ठन कर जाइए ।
 उधारमें लिया सूट---
   महाकवि ने अपने किसी परिचित से उधार में सूट वगैरह लिया और पहुंच गए राजा के द्वार । द्वारपालों ने सलामी ठोकी और बड़े-अदब के साथ राजा के पास ले गए । राजा ने उनका स्वागत किया और डाइनिंग टेबुल पर खाने के लिए बैठाया ।
   महाकवि ने पहला कौर उठाकर 'ओ मेरे कोट, लो भोजन करो ।' इसी तरह पैंट और कोट से भी कहा ।
   राजा आश्चर्य चकित होकर कह बैठा-'महाकवि यह क्या कर रहे है ? महाकवि ने उत्तर दिया-'इसी सूट-बूट की वजह से अंदर आने का अवसर मिला । इसलिए पहले इन्हें ही खिलाना फर्ज है ।
   आजकल यही हो रहा है । किसी VIP के यहां लकदक, गिफ्ट वगैरह लेकर जाने पर जो महत्त्व मिलेगा, वह शानदार होगा  । 
 धनीबनने के लिए फटीचर बनना जरूरी---
    इसी तरह भीख मांग कर धनी होना चाहें तो फटीचर बन जाएं । मंदिर-मस्जिद के आसपास पुण्यार्थी जो भी आएंगे कुछ देकर ही जाएंगे । क्योंकि इस तरह के दान से पाप, पुण्य में कन्वर्ट होने का पूरा भरोसा लोगों को होता है । इसके अलावा गरीबी रेखा के नीचे वाला कार्ड बन जाएगा, पीएम आवास योजना में घर और तरह तरह की सहायता तकरीबन 3 लाख साल में कम से कम मिल ही जाएगी। शराफत में इतनी कमाई की गारंटी कोई नहीं दे सकता।
                     -सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।©

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