कोरोना महामारी के आतंक के बीच जो तथ्य उभर कर सामने आ रहे हैं, वह यह है कि मनुष्य को हजारों-हजार साल पहले अपने पूर्वजों की जीवनशैली फिर से अपनानी होगी । भारतीय ऋषियों ने आरण्यक संस्कृति की जो महत्ता गायी, वह यूं ही नहीं गायी । पेड़ों, पर्वतों, नदियों, झरनों को देवता, तमाम पशुओं को देवी देवताओं का वाहन तथा हर जीव-जंतुओं के प्रति दयाभाव रखने का विधान बनाया । अत्यंत कमजोर जीव चींटी को शनिवार के दिन आंटा-चीनी खिलाने के लिए कहा । क्योंकि मानव के बाहर का आवरण जितना मजबूत और स्वस्थ होगा, मनुष्य का आंतरिक तंत्र भी उतना ही मजबूत होगा ।
भारतीय समाज में साढ़े साती शनि, कालसर्प दोष, पितृदोष आदि ऐसे योग हैं जिसमें अनिष्ट बताया गया है। इस योग के मनोविज्ञान को भी समझने की जरूरत है । शनिदेव आमजनता के देवता हैं । इस आमजनता में उन्हें विशेष रूप से शनिदेव मानते हैं, जो निरीह, असहाय और अपनी पीड़ा को व्यक्त नहीं कर पाते । प्रायः शनिदेव की कुदृष्टि से भारी क्षति की बात सुनने को मिलती है । जिसके पास अकूत सम्पदा है, क्षति तो उनकी ही होगी । जिसके पास कुछ है ही नहीं उसकी क्या क्षति होगी ? यदि जीवन में लगे कि शनिदेव रुष्ट हैं तो व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने से अशक्त और असहाय को मदद करे । अपने यहां काम करने वालों को अनर्गल पीड़ित न करे । उनके प्रति सद्भाव और स्नेह बढ़ा दे । समाजमें अशक्त लोगों की मदद करे । लेकिन मदद करते समय थोड़ा ध्यान भी देना चाहिए । किसी आलसी व्यक्ति को रुपया पैसा देने की प्रवृति को दोषपूर्ण कहा गया है क्योंकि इससे वह व्यक्ति और आलसी होता जाएगा। जो समाज के लिए बोझ ही बनेगा । किसी असहाय बच्चे को पढ़ने के लिए किताब, कॉपी तथा किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त योगदान आदि किया जा सकता है । फिर शनिदेव इतने प्रसन्न होंगे जितना शनिदेव की शांति के लिए अन्य किसी तरह के किए गए उपाय से ज्यादा प्रभावकारी सिद्ध होगा । इस नए 'प्रमादी' नामक संवत्सर की शुरुआत शनि-पंचक से हुआ है । अतः इस वर्ष शनिदेव की कृपा के लिए जैसे जल उपर से नीचे बहते हुए प्यास बुझाता है, उसी तरह की तरलता लाभप्रद होगी ।
अब रहा कालसर्प दोष और पितृदोष तो इसका भी आशय इन शब्दों से ही प्रकट होता है । शब्द ब्रह्म है । शब्दों की अधिष्ठाता देवी माता सरस्वती और गणेश जी है । इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना करते समय सबसे पहले श्लोक में 'वंदे वाणीविनायकौ' लिखा और माता सरस्वती और श्री गणेश जी से आशीर्वाद मांगा । इसलिए शब्दों की आत्मा को समझने की कोशिश जरूर करनी चाहिए । कालसर्प का अर्थ ही है कि समय सर्प की भांति निगलता और काटता है । इस समय के विष से मुक्त होने के लिए अपने इर्द-गिर्द शुभकामनाओं का पहरा रखना चाहिए। यह तभी संभव है जब व्यक्ति संवेदनशील होगा । पितृदोष के भय से परेशान होने की जगह उन परम्पराओं, सिद्धांतों तथा नियमों को मजबूती से पकड़े रहना चाहिए जिस पर हमारे पूर्वज चलते रहे हैं । जिन पूर्वजों की वजह से हमें जीवन मिला है, उसे पुरातन, रूढ़िवादी तथा दकियानूसी कहकर कोसना नहीं चाहिए । पितरों से जुड़े होने का मतलब हरा-भरा बने रहना । जिस प्रकार वृक्ष अपने जड़ से जुड़ा रहता है तो हराभरा रहता है । वंशवृक्ष में हम भी पितरों की डाल से लटके हुए नीचे की तरह दिखाई देते हैं। यदि टूट कर गिर गए तो अस्तित्व समाप्त हो जाएगा । इसलिए इस 'प्रमादी' संवत्सर में प्राचीन ऋषियों, विद्वानों की बातों को जरूर आत्मसात करना चाहिए ।
-साकेत पांडेय, मिर्जापुर ।
मो-9452688371
भारतीय समाज में साढ़े साती शनि, कालसर्प दोष, पितृदोष आदि ऐसे योग हैं जिसमें अनिष्ट बताया गया है। इस योग के मनोविज्ञान को भी समझने की जरूरत है । शनिदेव आमजनता के देवता हैं । इस आमजनता में उन्हें विशेष रूप से शनिदेव मानते हैं, जो निरीह, असहाय और अपनी पीड़ा को व्यक्त नहीं कर पाते । प्रायः शनिदेव की कुदृष्टि से भारी क्षति की बात सुनने को मिलती है । जिसके पास अकूत सम्पदा है, क्षति तो उनकी ही होगी । जिसके पास कुछ है ही नहीं उसकी क्या क्षति होगी ? यदि जीवन में लगे कि शनिदेव रुष्ट हैं तो व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने से अशक्त और असहाय को मदद करे । अपने यहां काम करने वालों को अनर्गल पीड़ित न करे । उनके प्रति सद्भाव और स्नेह बढ़ा दे । समाजमें अशक्त लोगों की मदद करे । लेकिन मदद करते समय थोड़ा ध्यान भी देना चाहिए । किसी आलसी व्यक्ति को रुपया पैसा देने की प्रवृति को दोषपूर्ण कहा गया है क्योंकि इससे वह व्यक्ति और आलसी होता जाएगा। जो समाज के लिए बोझ ही बनेगा । किसी असहाय बच्चे को पढ़ने के लिए किताब, कॉपी तथा किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त योगदान आदि किया जा सकता है । फिर शनिदेव इतने प्रसन्न होंगे जितना शनिदेव की शांति के लिए अन्य किसी तरह के किए गए उपाय से ज्यादा प्रभावकारी सिद्ध होगा । इस नए 'प्रमादी' नामक संवत्सर की शुरुआत शनि-पंचक से हुआ है । अतः इस वर्ष शनिदेव की कृपा के लिए जैसे जल उपर से नीचे बहते हुए प्यास बुझाता है, उसी तरह की तरलता लाभप्रद होगी ।
अब रहा कालसर्प दोष और पितृदोष तो इसका भी आशय इन शब्दों से ही प्रकट होता है । शब्द ब्रह्म है । शब्दों की अधिष्ठाता देवी माता सरस्वती और गणेश जी है । इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना करते समय सबसे पहले श्लोक में 'वंदे वाणीविनायकौ' लिखा और माता सरस्वती और श्री गणेश जी से आशीर्वाद मांगा । इसलिए शब्दों की आत्मा को समझने की कोशिश जरूर करनी चाहिए । कालसर्प का अर्थ ही है कि समय सर्प की भांति निगलता और काटता है । इस समय के विष से मुक्त होने के लिए अपने इर्द-गिर्द शुभकामनाओं का पहरा रखना चाहिए। यह तभी संभव है जब व्यक्ति संवेदनशील होगा । पितृदोष के भय से परेशान होने की जगह उन परम्पराओं, सिद्धांतों तथा नियमों को मजबूती से पकड़े रहना चाहिए जिस पर हमारे पूर्वज चलते रहे हैं । जिन पूर्वजों की वजह से हमें जीवन मिला है, उसे पुरातन, रूढ़िवादी तथा दकियानूसी कहकर कोसना नहीं चाहिए । पितरों से जुड़े होने का मतलब हरा-भरा बने रहना । जिस प्रकार वृक्ष अपने जड़ से जुड़ा रहता है तो हराभरा रहता है । वंशवृक्ष में हम भी पितरों की डाल से लटके हुए नीचे की तरह दिखाई देते हैं। यदि टूट कर गिर गए तो अस्तित्व समाप्त हो जाएगा । इसलिए इस 'प्रमादी' संवत्सर में प्राचीन ऋषियों, विद्वानों की बातों को जरूर आत्मसात करना चाहिए ।
-साकेत पांडेय, मिर्जापुर ।
मो-9452688371


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