"मिलन का प्रभात" कमल बाजपेयी

पहली ही नज़र में आपने यूँ देखा,
गालों में बन गई ज्यूँ सुरमई रेखा,
पंकज का लाल पन फिर अधरों ने खींचा,
छुई मुई का अर्क तब पलकों में मीचा,
स्पंदन त्वरित हुए हाव भाव मूक,
पहले न होता था ऐसा सलूक
वाणी अवरुद्ध तब शिखा हुई टेढ़ी,
पूनम का चाँद चला राह टेढ़ी - मेढ़ी,
चाँदनी विलुप्त हुई अन्धकार छाया,
मिलन का प्रभात गया वापस न आया ।
◆Written by ~ कमल बाजपेई

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