"दिल की ज़ुबान बोलती है" कमल बाजपेई

◆किस पे यकीं करु साकी मयखाने में,
जब वे ही बेवफा निकले ज़माने में ।
◆दिल पे जो घाव हो गए उनसे न कुछ मिला,
दिल ही नहीं रहा अपना ज़ख्मों का क्या गिला ।
◆दिल की ज़ुबान बोलती है था यकीं नहीं,
एक रोज़ झुक के दिल ने कहा बहरे हो मियाँ।
◆दिल में जो बात लग गई आँखों ने कह दिया,
देखा है आज मैंने अभी ऐसा वाकया ।
◆जन्नत की हूर है कहीं देखा नहीं कभी,
मन की खुली जब आँख, देखा पास थी वहीं ।
◆दिल का ज़हर लबों पे आज आ ही तो गया,
दर्पण है खोल देता सभी राज़ व गिला ।
◆Written by ~ कमल बाजपेई

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