बरगद प्राकृतिक आघातों से रक्षा करता है ।
मानवजन्य महामारी और प्राकृतिक आपदा से जीवन बचाने के लिए भारतीय ऋषियों ने प्राकृतिक पदार्थों के साथ गहरा संबन्ध ही बनाने का संदेश ही नहीं दिया बल्कि इनसे मिलने वाले प्राणरक्षा तत्वों के कारण पेड़-पौधों, नदी, सूरज, चाँद, अंतरिक्ष आदि को देवी-देवता मानकर पूजा करने का विधान बनाया। भारतीय ऋषियों के इस चिंतन को बहुत से देशों और भिन्न दृष्टि रखने वालों ने अंधविश्वासों की नजर से इसी लिया । लेकिन अति भौतिकतावादी युग में आर्थिक समृद्धि की होड़ में मानव जीवन के समक्ष मंडराते मृत्यु के बादलों के चलते अब सम्पूर्ण विश्व की सोच बदली है । इस सोच के बदले योगेश्वर श्री कृष्ण के 'सभी धर्मों को छोड़कर सिर्फ मेरी शरण में रहो' उपदेश को थोड़ा बदल कर 'प्रकृति की शरण में रहो' के लिए मजबूर कर दिया है । विश्व को निगलने को आतुर वैश्विक महामारी के बीच जो आर्तनाद सुनाई पड़ रहा है वह यह है कि इम्युनिटी (प्रतिरक्षातंत्र) मजबूत की जाए और इसके लिए प्रकृति को परिवार का मुखिया माना जाए । ग्रीष्म ऋतु में प्रायः बीमारियां बढ़ती रही हैं । इसलिए वृक्षों के संरक्षण में रहकर धार्मिक कार्यक्रमों एवं पूजन सम्पन्न करने के विधान किए गए । इसी क्रम में ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को उत्तर भारत में वट सावित्री का व्रत और पूजा आस्था के साथ सौभाग्यवती महिलाएं करती हैं । वट प्रजाति के वृक्षों में बरगद के साथ पीपल, गूलर, पाकर, ढेसूर पेड़ शामिल है । अपनी टहनियों से स्वयं को वेष्टित (स्वयं को लपेट लेना) करने के कारण ये वटवृक्ष हैं । इसमें सबसे अधिक वेष्टन करने वाला वृक्ष बरगद ही है । ढेसूर तो चट्टानी पहाड़ों के पत्थरो पर उगता हैं, पीपल अहर्निश आक्सीजन देता है लेकिन बरगद तो धरती को आग का गोला होने से बचाता है । पर्यावरणविदों का शोध है कि इस पृथ्वी से वट प्रजाति के वृक्षों में सिर्फ बरगद को समाप्त कर दिया जाए उसी दिन महाप्रलय आ जाएगा ।केवल भारत में नहीं बल्कि कई विकसित देशों में इन पेड़ों का नामकरण धर्म के साथ जोड़कर फाइबर रिलीजियस, फाइकस ग्लूमेरेटियस आदि से किया गया है । अरब देशों में भी भारत में पूजे जाने वाले अनेक वृक्षों को महत्त्व दिया जाता है । इस तरह के वृक्षों को आजाद-ए- दरख्त-ए-हिन्द कहा जाता है ।
बरगद की पूजा कर सावित्री ने मौत के देवता यमराज को दी चुनौती
वट-सावित्री व्रत के दौरान बरगद की विधिवत पूजा की जाती है । वटसावित्री व्रत की मान्यता तो सत्ययुग में पतिव्रता सावित्री द्वारा अपने पति को कठोर तपस्या के बल पर यमराज के चन्गुल से मुक्त कराने से जुडी है लेकिन त्रेता में श्रीराम एवं द्वापर में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने इन पेड़ों की पूजा की । भगवान श्रीराम जब वनवास के लिए प्रयाग में भरद्वाज ऋषि के आश्रम से चित्रकूट की ओर बढ़ते हैं तो लक्ष्मण से बरगद के पेड़ से मिलने वाले दूध लाने के लिए कहा। वाल्मीकि रामायण में इस प्रसंग का उल्लेख किया गया है । श्रीराम बरगद के पत्तों के दूध से जल्द तपस्वी वेश होने का उल्लेख किया है क्योंकि पिता दशरथ ने तपस्वी रूप में जंगल जाने का आदेश दिया था । इससे प्रकट होता है कि कठिन साधना में इस वृक्ष का दूध सिर में लगाने से आत्मबल में वृद्धि होती है । वनस्पति विज्ञान की रिपोर्ट भी यदि बरगद के वृक्ष न हो तो ग्रीष्म ऋतु में धरती पर जीवन नष्ट हो जाए, ऐसा बताती है । मानव सहित सभी जीव जिन्दा नहीं रह सकते । धरती अग्निकुंड बन जाएगी और सब उसी में झुलस जाएंगे । श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के 18वें अध्याय के अनुसार कंस का दूत प्रलम्बासुर गोकुल को भस्म करने के लिए इसी ज्येष्ठ मास में भेष बदलकर आता है । अग्नि-वर्षा करने में माहिर प्रलम्बासुर की योजना थी कि वह कृष्ण जैसे प्रकृति-वैज्ञानिक का अपहरण कर मार डालेगा तो गोकुल तबाह हो जाएगा लेकिन कृष्ण उसे पहचान लेते हैं और वे अपनी टीम के साथ जिस पेड़ से मदद लेते हैं वह बरगद का ही पेड़ था जिसका नाम भांडीर था । श्रीकृष्ण आग बरसाने वाले प्रलम्बासुर की आग को पी जाते हैं । वनस्पति-विज्ञान की रिसर्च के अनुसार सूर्य की ऊष्मा का 27 प्रतिशत हिस्सा बरगद का पेड़ अवशोषित कर पुनः आकाश में नमी प्रदान कर लौटाता है जिससे बादल बनता है और वर्षा होती है । बरगद की इन्हीं विशेषताओं के चलते त्रेता युग में भरद्वाज ऋषि ने राम, सीता एवं लक्ष्मण को वट वृक्ष के नीचे ही रात्रि विश्राम की व्यवस्था करते हैं । दूसरे दिन प्रातः भरद्वाज ऋषि ने यमुना की पूजा के साथ बरगद के पेड़ की पूजा कर उससे आशीर्वाद लेने का उपदेश दिया । उस श्यामवट से जंगल के प्रतिकूल आघातों से रक्षा की प्रार्थना सीता करती हैं । श्रीमद्वाल्मीकि रामायण के अयोध्या काण्ड में इसका उल्लेख भी है ।
मनुष्य के ब्रेन जैसा बरगद
आस्था के इस वृक्ष को मानव-जीवन का संरक्षक इसलिए भी माना जाता है कि इस पेड़ की संरचना बिलकुल जीवधारियों जैसी है । मनुष्य के मष्तिष्क (ब्रेन) से निकलने वाले नर्वस सिस्टम (तन्त्रिका प्रणाली) की तरह इसकी जटाएं ऊपर से नीचे आती हैं और अपनी जड़ों, तना को ताकत देते हुए यह पेड़ लम्बे दिनों तक छाया देता है । शरीर में भी मष्तिष्क से मेरुदण्ड (स्पाइनल कॉर्ड) के सहारे मेरुरज (कैनियल नर्वस) बरगद की जटाओं (टहनियों और वटोहों) की तरह नीचे की ओर आती हैं । शरीर को स्वस्थ बनाने में इस पेड़ की प्रभावशाली भूमिका होती है। खुले स्थान पर इसके रोपण से इसका घेरा इतना बड़ा हो जाता है कि हजारो-हजार लोग इसके नीचे बैठ सकते हैं और इसकी ऊंचाई 100 फीट तक पहुंच जाती हैं ।
सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा के भी संकेत प्रकृति के सहारे अकाल मौत के मुंह जाने से बचना भी है । सावित्री मद्रदेश के राजा अश्वपति की कन्या थी । सन्तानविहीन राजा ने वेदमाता सावित्री जो सूर्य की पुत्री हैं कि कठोर तपस्या की जिनके वरदान से पैदा हुई कन्या का नाम सावित्री ही रखा गया । सूर्य की वरेण्य किरणों के साथ योग के फलस्वरूप प्राप्त कन्या सावित्री के तेज के चलते कोई राजकुमार जब विवाह योग्य नहीं मिला तो पिता के आदेश पर सावित्री ने धर्मनिष्ठ एवं सत्यनिष्ठ शाल्वदेश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र से स्वयं वरण करने का निर्णय किया । विवाह की तैयारी शुरू हुई कि इसी बीच महर्षि नारद आ गए और सत्यवान की आयु एक साल ही बताया । पिता की चिंता देख सावित्री ने कहा कि एक पति को कन्यादान का संकल्प और किसी प्रकार के दान की घोषणा को स्वहित में बदलना शास्त्रविरुद्ध है । सावित्री की दृढ़ता पर विवाह सम्पन्न हो गया । नारद द्वारा बताए गए मृत्यु-दिवस के चार दिन पूर्व सावित्री को बुरा स्वप्न आता है । दूसरे दिन वह निराहार व्रत का संकल्प ले कर यज्ञ-समिधा के लिए पति के साथ जंगल में लकड़ी लेने खुद भी चलने के लिए कहती है जिस पर श्वसुर अनुमति दे देते हैं । शास्त्रों में यज्ञ आदि के लिए यज्ञकर्ता को खुद लकड़ी लाना चाहिए । इस प्रकार सत्यवान को उस दिन लकड़ी काटते हुए अचानक सिर में तेज दर्द होने लगा । सावित्री पति का सिर गोद में लेकर बैठ गयी । तभी एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ और सत्यवान का अंगुष्ठ बराबर प्राण लेकर जाने लगा । सावित्री ने दिव्य पुरुष से पूछा- आप कौन है ? जवाब मिला- मैं यमराज । फिर सावित्री बोली- प्राण लेने तो आपके यमदूत आते हैं, आप स्वयं क्यों आए ? जिस पर वे बोले-सत्यवान एक धर्मनिष्ठ और सत्यनिष्ठ राजकुमार है, इसलिए मैं स्वयं आया, दूतों में सत्यवान को ले जाने की क्षमता नहीं है । इन्हीं लगातार संवादों के बीच पतिव्रता पर प्रकृति के संरक्षक बरगद की छत्रछाया का असर कि वह अपने श्वसुर द्युमत्सेन की नेत्रज्योति लौट जाए, खोया राज्यवापस हो जाए और स्वयं पुत्रवती बन जाए का वरदान यमराज से ले बैठी । वरदान के बाद भी यमराज सत्यवान को यमलोक ले ही जा रहे थे और सावित्री उनका पीछा कर रही थी । यमराज ने कहा और भी जो वरदान मांगना हो, मांग लो लेकिन सत्यवान तो जीवित नहीं हो सकेगा । तब सावित्री ने कहा-पुत्रवती होने का आप वरदान दे चुके हैं ।
अंत में यमराज ने सत्यवान का प्राण वापस किया । स्त्रियों की वट-वृक्ष की पूजा के कई अर्थ हैं । एक तो स्त्री रोगों के नियंत्रण में वट-वृक्ष सहायक होते हैं । वट वृक्ष की छाया, छाल, फल,पत्ते निःसन्तान महिलाओं में गर्भधारण की क्षमता प्रदान करता है । इसके अलावा अन्य स्त्री-रोगों में में भी इस वृक्ष का औषधीय महत्त्व है । इसके पत्तों से निकलने वाला दूध आर्थराइटिस दर्द को नियंत्रित करता है । मासिक अनियमितता में बरगद और पीपल की छाया और पत्तों का सेवन लाभकारी है । इसके अलावा यह पेड़ मानव-शरीर जैसा होने की वजह से सूर्यकिरणों से निकलने वाली लाभप्रद ऊर्जा को धरती की ओर प्रेषित करता है । पीपल की तरह यह भी कार्बन अधिक अवशोषित करता है । वट सावित्री की पूजा में पहले दिन बरगद पेड़ लगाने, दूसरे दिन इनकी रखवाली करने और तीसरे दिन पूजा करने का भी विधान है ताकि ज्येष्ठ माह में रोपित पौधे वर्षा ऋतु में पूरी तरह बढ़ने लगे ।
सलिल पाण्डेय, मिर्जापुर ।
शोधपत्र में परिवर्तन कापीराइट एक्ट का उल्लंघन माना जाएगा ।





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