"धन्य तुम्हारे धन्य हमारे" कमल बाजपेई

◆है गिरिराज यहाँ का मस्तक 
सागर अपने पाँव पखारे ।
चारो ऋतुएँ क्रम से आती
धन्य तुम्हारे धन्य हमारे ।।
◆रंग जुदा भाषा बहुतेरी
पर आपस मे प्रीत घनेरी ।
भौतिकता में भी है अंतर 
कोई शिखर कोई अवनी पर ।।
◆कही सलवार कही पर साड़ी 
शाकाहारी - मांसाहारी ।
धर्म जुदा पर लक्ष्य एक है
भारतवासी सभी नेक हैं ।।
◆है अनेक पर रहते ऐसे 
उंगली पांच मुष्टिका जैसे  ।
भिन्न - भिन्न परिवेश एक है 
दीन धर्म से बड़ा देश है  ।।
◆भारत माता पिता राष्ट्र पर
बलि - बलि जाते वारे न्यारे ।
एक घाट में पानी पीते 
सिंह और अजहा गण सारे ।।
◆है गिरिराज यहाँ का मस्तक 
सागर अपने पाँव पखारे ।
चारो ऋतुएँ क्रम से आती
धन्य तुम्हारे धन्य हमारे ।।
◆written by-कमल बाजपेई

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