ई0 अभिषेक श्रीवास्तव
रायबरेली: एक स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता पक्ष के द्वारा लिए गए निर्णय में अगर कमी है, तो विपक्ष को अवश्य उसपर ध्यानाकषर्ण करना चाहिए। विपक्ष की उतनी ही भूमिका होती है, लोकतंत्र में जितनी सत्ता पक्ष की।
किन्तु विरोध कब करना है, ये बहुत बड़ा निर्णय होता है। जरूरी नही है कि, सत्ता पक्ष ने जो भी निर्णय लिए हो वो सब गलत ही हो। एक विपक्ष वो भी हुआ करता था, भारतीय लोकतंत्र में जब विपक्ष के सांसद होते हुए भी अटल बिहारी बाजपेयी जी को प्रतिनिधि के तौर पर भेजा जाता था। लेकिन आज विपक्ष के विरोध करने की ये स्तिथि हो गयी कि, उनको प्रधान सेवक के कपड़ो, जूतों, घड़ी, चश्मा इत्यादि पर भी विरोध प्रदर्शित करना पड़ रहा है, और तो और यदि प्रधान सेवक के द्वारा किसी के सम्मान में यदि कुछ करने का आह्वाहन भी कर दिया गया हो तो उसमें में रो रो कर प्रदर्शन करना पड़ जाता है।
तो इससे क्या जनता को क्या समझ लेना चाहिए कि, प्रधान सेवक द्वारा उनके पक्ष में लिए जा रहे सभी निर्णय सही हैं। क्योंकि विपक्ष तो उनकी दिनचर्या पर भी सवाल खड़ा करता है, तो कैसे उसके विरोध पर जनता यकीन करें कि, वो सही विरोध कर रहे हैं। मेरा ये मनना है कि, एक स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता के कार्यो का अवश्य विरोध होना चाहिए, किन्तु उन निर्णय का जो देश हित में न हो। विपक्ष के विरोध का तो ये नजरिया हो गया है कि, अगर पालघर में दो निहत्थे संतो की भीड़ द्वारा हत्या कर दी जाती है, तो कहा जाता है कि, वो किसी अफवाह का शिकार हो गए, और यही घटना अगर किसी समुदाय विशेष के साथ घटित हो जाती है, तो संप्रदायिकया हो जाती है। तब देश मे असहिषुणता आ जाती है, वो धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाने लगते हैं। वो स्यवं दोहरा मापदंड अपनाते हैं और आरोप सत्ता पे लगा देते हैं।
जहां तक मुझे ज्ञात है वह यह कि, अभी तक सत्तारुढ़ दल ने कोई ऐसा कदम नही उठाया और न ही कोई ऐशा निर्णय लिया है, जिससे सिर्फ किसी एक समुदाय या वर्ग को ही लाभ मिलता हो, किंतु विपक्ष तुरंत उनके निर्णय को धर्म की परिपाटी पे तौलने लगता है, तो धर्मनिरपेक्ष कौन हुआ सत्ता या विपक्ष ??
सत्ता पक्ष तो जो भी योजनाये, निर्णय या कानून लाता है, वो तो सर्व समाज और सम्पूर्ण भारत वर्ष के नागरिकों के लिए एक समान होता है।
तो क्यूं ये संप्रदायिकया या असहिष्णुता का रोना विपक्ष द्वरा समय समय पर रोया जाता है।
मुझे लगता है आज भारत वर्ष जिस प्रकार इस कोरोना नामक महामारी से दृण संकल्पित हो कर लड़ रहा है। अवश्य इससे बाहर निकल कर एक नये भारत का उदय होगा। किंतु संकट के इस घड़ी में विपक्ष को भी सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की जरूरत है। एक नए भारत के निर्माण के लिए समस्त भारतवाशी को एक साथ मिलकर कार्य करना होगा।
रायबरेली: एक स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता पक्ष के द्वारा लिए गए निर्णय में अगर कमी है, तो विपक्ष को अवश्य उसपर ध्यानाकषर्ण करना चाहिए। विपक्ष की उतनी ही भूमिका होती है, लोकतंत्र में जितनी सत्ता पक्ष की।
किन्तु विरोध कब करना है, ये बहुत बड़ा निर्णय होता है। जरूरी नही है कि, सत्ता पक्ष ने जो भी निर्णय लिए हो वो सब गलत ही हो। एक विपक्ष वो भी हुआ करता था, भारतीय लोकतंत्र में जब विपक्ष के सांसद होते हुए भी अटल बिहारी बाजपेयी जी को प्रतिनिधि के तौर पर भेजा जाता था। लेकिन आज विपक्ष के विरोध करने की ये स्तिथि हो गयी कि, उनको प्रधान सेवक के कपड़ो, जूतों, घड़ी, चश्मा इत्यादि पर भी विरोध प्रदर्शित करना पड़ रहा है, और तो और यदि प्रधान सेवक के द्वारा किसी के सम्मान में यदि कुछ करने का आह्वाहन भी कर दिया गया हो तो उसमें में रो रो कर प्रदर्शन करना पड़ जाता है।
तो इससे क्या जनता को क्या समझ लेना चाहिए कि, प्रधान सेवक द्वारा उनके पक्ष में लिए जा रहे सभी निर्णय सही हैं। क्योंकि विपक्ष तो उनकी दिनचर्या पर भी सवाल खड़ा करता है, तो कैसे उसके विरोध पर जनता यकीन करें कि, वो सही विरोध कर रहे हैं। मेरा ये मनना है कि, एक स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता के कार्यो का अवश्य विरोध होना चाहिए, किन्तु उन निर्णय का जो देश हित में न हो। विपक्ष के विरोध का तो ये नजरिया हो गया है कि, अगर पालघर में दो निहत्थे संतो की भीड़ द्वारा हत्या कर दी जाती है, तो कहा जाता है कि, वो किसी अफवाह का शिकार हो गए, और यही घटना अगर किसी समुदाय विशेष के साथ घटित हो जाती है, तो संप्रदायिकया हो जाती है। तब देश मे असहिषुणता आ जाती है, वो धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाने लगते हैं। वो स्यवं दोहरा मापदंड अपनाते हैं और आरोप सत्ता पे लगा देते हैं।
जहां तक मुझे ज्ञात है वह यह कि, अभी तक सत्तारुढ़ दल ने कोई ऐसा कदम नही उठाया और न ही कोई ऐशा निर्णय लिया है, जिससे सिर्फ किसी एक समुदाय या वर्ग को ही लाभ मिलता हो, किंतु विपक्ष तुरंत उनके निर्णय को धर्म की परिपाटी पे तौलने लगता है, तो धर्मनिरपेक्ष कौन हुआ सत्ता या विपक्ष ??
सत्ता पक्ष तो जो भी योजनाये, निर्णय या कानून लाता है, वो तो सर्व समाज और सम्पूर्ण भारत वर्ष के नागरिकों के लिए एक समान होता है।
तो क्यूं ये संप्रदायिकया या असहिष्णुता का रोना विपक्ष द्वरा समय समय पर रोया जाता है।
मुझे लगता है आज भारत वर्ष जिस प्रकार इस कोरोना नामक महामारी से दृण संकल्पित हो कर लड़ रहा है। अवश्य इससे बाहर निकल कर एक नये भारत का उदय होगा। किंतु संकट के इस घड़ी में विपक्ष को भी सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की जरूरत है। एक नए भारत के निर्माण के लिए समस्त भारतवाशी को एक साथ मिलकर कार्य करना होगा।

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