रजनीकांत अवस्थी
महराजगंज/रायबरेली: महराजगंज कस्बे के रहने वाले एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र के वरिष्ठ संवाददाता सुभाष पांडेय की धर्मपत्नी अनुपमा पांडेय, 22 मई 2020 दिन शुक्रवार को होने वाली बट सावित्री व्रत कथा का महत्व बताते हुए कहती है कि, प्राचीनकाल में मद्र देश में अश्वपति नाम के प्रतापी राजा रहते थे। वे बडे़ ही धर्मात्मा थे, किंतु संतानहीन थे। श्रीमती पांडेय आगे बताती हैं कि, पंडितों के कथनानुसार उन्होंने एक यज्ञ कराया, जिसके प्रभाव से एक कन्या उत्पन्न हुई। कन्या का नाम सावित्री रखा गया। बड़ा होने पर उसने विवाह के लिए द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान का वरण किया। इधर नारदजी को जब पता लगा, तो वे राजा से आकर बोले कि, आपकी कन्या ने वर खोजने में भारी भूल की है। सत्यवान गुणी और धर्मात्मा है। परंतु अल्पायु है। एक वर्ष बाद इसकी मृत्यु हो जाएगी।
आपको बता दें कि, बट सावित्री व्रत कथा के महत्व को समझाते हुए श्रीमती पांडेय बताती हैं कि, राजा चिंतित हुए और सावित्री को उसका निर्णय बदलने के लिए बहुत समझाए, किंतु सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही और दोनों का विवाह हो गया। राजा द्युमत्सेन दुर्भाग्य से वन में रहते थे, और सत्यवान सहित वहीं सावित्री सास-ससुर और पति की सेवा करने लगी। नारदजी के बताए हुए दिन के अनुसार जिस दिन सत्यवान की मृत्यु थी, उस दिन वह जंगल में लकड़ी काटने जा रहा था। सावित्री भी उसके संग चल दी।
सत्यवान जैसे ही कुल्हाड़ी लेकर पेड़ पर चढ़ा, उसके सिर में असहनीय पीड़ा हुई और नीचे उतरकर उसने सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। कुछ समय पश्चात् यमराज दूतों सहित आए और अंगूठे भर के जीव को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे। सावित्री भी पीछे-पीछे चल दी। यमराज के बार -बार कहने पर वह नहीं लौटी और बोली कि, भारतीय नारी पति के साथ ही जाती है। यमराज खुश होकर वर मांगने के लिए कह दिए, तो उसने वर में अंधे सास-ससुर को नेत्र और गया हुआ राज-पाट भी वापस मांग लिया।
श्रीमती पांडेय आगे बताती हैं कि, यमराज आगे बढ़ें तो सावित्री पुनः यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने खुश होकर पुनः अंतिम वर मांगने को कहा। तब सावित्री ने कहा कि " वह सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनना चाहती है। "यमराज तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गये। सावित्री वट वृक्ष के नीचे आयी तो उसके पति जीवित हो गये। इस तरह सावित्री ने अपने तपोबल से अपने खोए राज्य, तथा पति को भी यमराज से वापस ले आयी, तभी से इस व्रत को करने की परंपरा है। यह भारतीय नारियों का तपोव्रत है जिसके सामने काल भी अपना मुंह मोड़ लेता है।
महराजगंज/रायबरेली: महराजगंज कस्बे के रहने वाले एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र के वरिष्ठ संवाददाता सुभाष पांडेय की धर्मपत्नी अनुपमा पांडेय, 22 मई 2020 दिन शुक्रवार को होने वाली बट सावित्री व्रत कथा का महत्व बताते हुए कहती है कि, प्राचीनकाल में मद्र देश में अश्वपति नाम के प्रतापी राजा रहते थे। वे बडे़ ही धर्मात्मा थे, किंतु संतानहीन थे। श्रीमती पांडेय आगे बताती हैं कि, पंडितों के कथनानुसार उन्होंने एक यज्ञ कराया, जिसके प्रभाव से एक कन्या उत्पन्न हुई। कन्या का नाम सावित्री रखा गया। बड़ा होने पर उसने विवाह के लिए द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान का वरण किया। इधर नारदजी को जब पता लगा, तो वे राजा से आकर बोले कि, आपकी कन्या ने वर खोजने में भारी भूल की है। सत्यवान गुणी और धर्मात्मा है। परंतु अल्पायु है। एक वर्ष बाद इसकी मृत्यु हो जाएगी।
आपको बता दें कि, बट सावित्री व्रत कथा के महत्व को समझाते हुए श्रीमती पांडेय बताती हैं कि, राजा चिंतित हुए और सावित्री को उसका निर्णय बदलने के लिए बहुत समझाए, किंतु सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही और दोनों का विवाह हो गया। राजा द्युमत्सेन दुर्भाग्य से वन में रहते थे, और सत्यवान सहित वहीं सावित्री सास-ससुर और पति की सेवा करने लगी। नारदजी के बताए हुए दिन के अनुसार जिस दिन सत्यवान की मृत्यु थी, उस दिन वह जंगल में लकड़ी काटने जा रहा था। सावित्री भी उसके संग चल दी।
सत्यवान जैसे ही कुल्हाड़ी लेकर पेड़ पर चढ़ा, उसके सिर में असहनीय पीड़ा हुई और नीचे उतरकर उसने सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। कुछ समय पश्चात् यमराज दूतों सहित आए और अंगूठे भर के जीव को लेकर दक्षिण दिशा की ओर चलने लगे। सावित्री भी पीछे-पीछे चल दी। यमराज के बार -बार कहने पर वह नहीं लौटी और बोली कि, भारतीय नारी पति के साथ ही जाती है। यमराज खुश होकर वर मांगने के लिए कह दिए, तो उसने वर में अंधे सास-ससुर को नेत्र और गया हुआ राज-पाट भी वापस मांग लिया।
श्रीमती पांडेय आगे बताती हैं कि, यमराज आगे बढ़ें तो सावित्री पुनः यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने खुश होकर पुनः अंतिम वर मांगने को कहा। तब सावित्री ने कहा कि " वह सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनना चाहती है। "यमराज तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गये। सावित्री वट वृक्ष के नीचे आयी तो उसके पति जीवित हो गये। इस तरह सावित्री ने अपने तपोबल से अपने खोए राज्य, तथा पति को भी यमराज से वापस ले आयी, तभी से इस व्रत को करने की परंपरा है। यह भारतीय नारियों का तपोव्रत है जिसके सामने काल भी अपना मुंह मोड़ लेता है।

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