प्रगतिशील लेखक वीरेंद्र कुमार बरनवाल नहीं रहे

मिर्जापुर। हिंदी जगत के एक लेखक, कवि और समीक्षक के अवसान पर उनका नाम लिखते वक्त हिंदी साहित्य की अधिष्ठात्री देवी नाम के आगे स्वर्गीय की जगह सूर्यकोटि समप्रभः लिखने के लिए प्रेरित ही नहीं बाध्य कर रही हैं ।
नाम है लेखन (वर्ण) जगत की पंक्ति (वाल) के वीर-पुरुष वीरेंद्र कुमार बरनवाल का-सर्व प्रथम बरनवाल साहब के लेखन का जिक्र उचित है।  उनकी पुस्तकें ‘मुस्लिम नवजागरण और अकबर इलाहाबादी का गांधीनामा’, ‘जिन्ना : एक पुनर्दृष्टि’ और 'हिंद स्वराज : नव सभ्यता विमर्श’ बहुपठित, बहुख्यात एवं कई-कई मामलों में गजेटियर की श्रेणी की पुस्तकें हैं 
जीवन परिचय- इस संबन्ध में सिर्फ यही उल्लेख करना उचित है कि सामान्य वायोडाटा जो बनाया जाता है, उसी फार्मेट में बरनवाल साहब का जिक्र करना उचित होगा क्योंकि जितना भी परिचय जानने की कोशिश की जाएगी, उतनी जिज्ञासा उनके लेखन, उनके प्रगतिगामी चिंतन और  उनके गहरे मनन को जानने के लिए बढ़ती जाएगी ।
 कुबेर के घर में चीफ इनकमटैक्स कमिश्नर पर मन में समाया था लिखना और पढ़ना बरनवाल साहब देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में चीफ इनकमटैक्स कमिश्नर थे लेकिन साहित्य-सृजन की धुन में वे रमे रहते थे। वहां पोस्टिंग के दौरान उन्होंने जिन्ना : एक पुनर्दृष्टि पुस्तक लिखी । यह 350 पेज की पुस्तक गांधी की अफ्रीकी यात्रा से लेकर स्वतन्त्रता मिलने तक की ऐसी पुस्तक है जैसे सोना-चांदी तौलने वाली भौतिक-तुला हुआ करती थी जो अब कम्प्यूटराइज्ड मशीन के रूप में देखी जा रही है। इस कसौटी पर भी उनकी पुस्तक मिलीग्राम तक का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। सिर्फ इसी पुस्तक को लिखने में उन्हें 8 साल लग गए । 
उप प्रधानमंत्री आडवाणी को अटलजी बना दिया था पुस्तक ने- कट्टर राष्ट्रवादी पार्टी के उपप्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी इस पुस्तक को पढ़कर उदारवादी स्व अटल बिहारी बाजपेई की पंक्ति में खड़े दिखने लगे । अपनी कट्टरवादी छवि उतार कर इतिहास की सच्चाई के हिमायती हो गए आडवाणी जी  गांधी और जिन्ना के संबन्ध में ।
निजी परिचय 21 अगस्त 1941 को फूलपुर आजमगढ़ में जन्मे बरनवाल साहब BHU से स्नातकोत्तर उत्तीर्ण किया तथा अंग्रेजी के प्राध्यापक बने। वर्ष 1969 में IRS में चयनित हुए । अफ्रीकी अश्वेत कविता विशेष रूप से समकालीन  नाइजीरियाई कविताओं  में गहरी अभिरुचि ।  'पानी के छीटे सूरज के चेहरे' संकलन  अश्वेत कविताओं का हिंदी में अनुवाद ।अंग्रेजी और हिंदी दोनों में प्रचुर लेखन और अनुवाद भी किया ।
 मिर्जापुर से संबन्ध- यहां उनकी रिश्तेदारियां तो थीं लेकिन अत्यंत गहरा लेखकीय संबन्ध राष्ट्रीय समीक्षक डॉ भवदेव पांडेय से रहा । बरनवाल साहब का लेखकीय परिवार बहुत बड़ा था जिसमें स्व नामवर सिंह, सेवानिवृत्त IPS एवं वर्धा यूनिवर्सिटी के कुलपति श्री  विभूतिनारायण राय, श्री मैनेजर पांडेय, श्री काशीनाथ सिंह आदि शामिल थे ।
जब सम्मेलन से किया बगावत- बरनवाल समाज के राष्ट्रीय अधिवेशन में तकरीबन 12 साल पहले उनका आना मिर्जापुर में हुआ था। बड़े तामझाम के साथ हुआ था यह सम्मेलन । उसमें बर्णवाल समाज के युवक-युवतियों में वैवाहिक-कठोरता लागू करने की बात उठी तो वे खुद ही वहां से उठ खड़े हुए और प्रेमघनमार्ग स्थित डॉ भवदेव पांडेय के आवास पर चले आए । उनका मानना था कि 21वीं सदी में युवावर्ग को जंजीरों में जकड़ना  जड़तावादी सोच है । डॉ भवदेव पांडेय के आवास पर  उन्होंने प्रेस-कॉन्फ्रेंस भी किया था । श्री लालकृष्ण आडवाणी पर पूछे गए एक सवाल पर उन्होंने आडवाणी को संकीर्ण सोच का नेता कहा था। 
यहां के कमिश्नर श्री सत्यजीत ठाकुर इनकमटैक्स आफिसर के रूप में उनके अधीनस्थ अधिकारी रहे । श्री ठाकुर ने उन्हें आदर्श अधिकारी तथा नेक इंसान बताया था ।
निधन पर शोक 12 जून को 80 साल के वीरेन्द्र कुमार बरनवाल के निधन पर डॉ भवदेव पांडेय शोध संस्थान ने श्रद्धांजलि व्यक्त की है। 
                       सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ