(अजलान अहमद सलमानी)
यह हिंदी भाषा की बहुत प्रिय कहावत है कि, नाच न जाने आंगन टेढ़ा। इसका यह मतलब होता है कि, हम अपने असफलताओं को स्वीकार नहीं करके उसका दोष दूसरों पर डालना चाहते हैं। जो बहादुर हो, वह अपनी गलतियों से सीखता है ना कि, दूसरों पर अपनी गलती डालता है। ऐसा इंसान अपनी हार के लिए हमेशा बहाने बनाता है। लेकिन अपनी कमजोरी को समझ कर भी अंजान रहना चाहता है। इसी कहावत पर एक कहानी जो बच्चों की है लेकिन हमें बहुत कुछ सिखाती है।
एक समय की बात है- एक अहंकारी लोमड़ी थी। एक दिन वह अपने रिस्तेदार से मिलने गई, जो पास के ही गांव में रहती थी। वह चलती गई, चलती गई! लेकिन कुछ दूर चलने के बाद वह थक गई और उसे भूख तथा प्यास भी लगने लगी। वह सोचने लगी कि, काश! कुछ खाने को मिल जाता। तभी उसे अंगूरों की एक बेल दिखाई दी। उसने बेल पर लगे अंगूर देखकर सोचा कि, यह अंगूर बहुत स्वादिष्ट और रस भरे दिख रहे हैं। वह उन अंगूरों को खाने के लिए ऊपर की ओर उछली। लेकिन अंगूर की ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकी।
क्योंकि अंगूर बहुत ऊंचाई पर लटक रहे थे, उसने फिर से एक बार कोशिश की, लेकिन फिर भी असफल रही। फिर लोमड़ी को समझ में आया कि, अंगूर तो बहुत ऊंचाई पर लगे हैं और वह वहां तक पहुंचना उसके लिए मुश्किल है। फिर भी वह यह कह कर वहां से चली कि, अंगूर तो खट्टे हैं। इसके साथ उसने यह भी कहा कि, कच्चे अंगूर मैं क्यों खाऊं? उसने अंगूरों पर एक और इल्जाम लगाया कि, यह अंगूर तो सड़े गले आधे खाए हुए और अस्वस्थ है। इसलिए मुझे यहां से जाना चाहिए, यह कहकर वह वहां से चली गई।
किसी ने सही कहा है कि, जब इंसान कुछ कर नहीं पाता या जो प्राप्त करना है उसे पा नहीं सकता तो वह कहता है कि, नाच न जाने आंगन टेढ़ा। लोमड़ी अंगूर न खा सकी, इसलिए उसने अंगूर को ही दोष दिया कि, वह खट्टे है। इसके साथ यह भी आरोप लगाया कि, अंगूर अस्वस्थ है।
यह हिंदी भाषा की बहुत प्रिय कहावत है कि, नाच न जाने आंगन टेढ़ा। इसका यह मतलब होता है कि, हम अपने असफलताओं को स्वीकार नहीं करके उसका दोष दूसरों पर डालना चाहते हैं। जो बहादुर हो, वह अपनी गलतियों से सीखता है ना कि, दूसरों पर अपनी गलती डालता है। ऐसा इंसान अपनी हार के लिए हमेशा बहाने बनाता है। लेकिन अपनी कमजोरी को समझ कर भी अंजान रहना चाहता है। इसी कहावत पर एक कहानी जो बच्चों की है लेकिन हमें बहुत कुछ सिखाती है।
एक समय की बात है- एक अहंकारी लोमड़ी थी। एक दिन वह अपने रिस्तेदार से मिलने गई, जो पास के ही गांव में रहती थी। वह चलती गई, चलती गई! लेकिन कुछ दूर चलने के बाद वह थक गई और उसे भूख तथा प्यास भी लगने लगी। वह सोचने लगी कि, काश! कुछ खाने को मिल जाता। तभी उसे अंगूरों की एक बेल दिखाई दी। उसने बेल पर लगे अंगूर देखकर सोचा कि, यह अंगूर बहुत स्वादिष्ट और रस भरे दिख रहे हैं। वह उन अंगूरों को खाने के लिए ऊपर की ओर उछली। लेकिन अंगूर की ऊंचाई तक नहीं पहुंच सकी।
क्योंकि अंगूर बहुत ऊंचाई पर लटक रहे थे, उसने फिर से एक बार कोशिश की, लेकिन फिर भी असफल रही। फिर लोमड़ी को समझ में आया कि, अंगूर तो बहुत ऊंचाई पर लगे हैं और वह वहां तक पहुंचना उसके लिए मुश्किल है। फिर भी वह यह कह कर वहां से चली कि, अंगूर तो खट्टे हैं। इसके साथ उसने यह भी कहा कि, कच्चे अंगूर मैं क्यों खाऊं? उसने अंगूरों पर एक और इल्जाम लगाया कि, यह अंगूर तो सड़े गले आधे खाए हुए और अस्वस्थ है। इसलिए मुझे यहां से जाना चाहिए, यह कहकर वह वहां से चली गई।
किसी ने सही कहा है कि, जब इंसान कुछ कर नहीं पाता या जो प्राप्त करना है उसे पा नहीं सकता तो वह कहता है कि, नाच न जाने आंगन टेढ़ा। लोमड़ी अंगूर न खा सकी, इसलिए उसने अंगूर को ही दोष दिया कि, वह खट्टे है। इसके साथ यह भी आरोप लगाया कि, अंगूर अस्वस्थ है।

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