सार........
⭕ हाथों में थीं माता रमाबाई, सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की तस्वीरें—सांसद राहुल गांधी से सुरक्षा, शिक्षा और गांव के विकास को लेकर करना चाहती थीं संवाद।
⭕ दो दिवसीय दौरे से पहले फैली कथित अफवाहों ने भी बढ़ाए सवाल, आखिर ग्रामीण बेटियों की आवाज किस तक पहुंचेगी?
विस्तार
रजनीकांत अवस्थी
महराजगंज/रायबरेली: नेता प्रतिपक्ष एवं रायबरेली सांसद राहुल गांधी के दो दिवसीय रायबरेली दौरे के दौरान महराजगंज क्षेत्र के मोन ग्राम सभा के लालगंज की तीन बेटियों का इंतजार और उनके हाथों में उठी तीन महान महिलाओं की तस्वीरें चर्चा का विषय बन गईं। तीनों बेटियां राहुल गांधी से मिलने और अपनी बात सीधे उनके सामने रखने की उम्मीद में करीब तीन घंटे पहले से ही उनके आने की बाट जोह रही थीं।
आपको बता दें कि, इन बेटियों के हाथों में माता रमाबाई आंबेडकर, क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की तस्वीरें थीं। उनके मन में अपने गांव की शिक्षा व्यवस्था, विकास और खास तौर पर अपनी सुरक्षा से जुड़े कई सवाल थे। उनका कहना था कि, मौजूदा परिस्थितियों में वे स्वयं को असुरक्षित महसूस करती हैं और अपनी समस्याओं को अपने सांसद एवं नेता प्रतिपक्ष तक सीधे पहुंचाना चाहती हैं।
जब राहुल गांधी का काफिला वहां से गुजरा तो कुछ क्षणों के लिए गाड़ी की रफ्तार धीमी हुई। इससे बेटियों को उम्मीद जगी कि, शायद उन्हें अपनी बात कहने का अवसर मिलेगा, लेकिन संवाद का वह अवसर नहीं बन सका।
यहीं से एक बड़ा सवाल भी सामने आता है—जब राहुल गांधी सार्वजनिक मंचों से संविधान की रक्षा और समानता की बात करते हैं, बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की तस्वीर और संविधान वाली किताब हाथ में लेकर लोगों से संविधान बचाने का आह्वान करते हैं, तो क्या उन बेटियों की आवाज तक पहुंचना भी उसी संवैधानिक संवाद का हिस्सा नहीं होना चाहिए?
लालगंज की इन बेटियों के हाथों में केवल तस्वीरें नहीं थीं, बल्कि वे उन महिलाओं की विरासत का प्रतीक लेकर खड़ी थीं, जिन्होंने शिक्षा, सामाजिक बराबरी और महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। ऐसे में उनका सवाल किसी एक व्यक्ति से मिलने भर का नहीं, बल्कि अपनी बात कहने और सुने जाने के अधिकार का भी था।
दौरे से पहले की चर्चाओं ने भी बढ़ाई नाराजगी: राहुल गांधी के रायबरेली दौरे से पहले क्षेत्र में पार्टी से जुड़े कुछ स्थानीय नेताओं द्वारा बाढ़ प्रभावित इलाकों के दौरे को लेकर चर्चाएं और सूचनाएं प्रसारित होने की बात भी सामने आई।ग्रामीणों और क्षेत्रीय लोगों में इसको लेकर काफी उम्मीद बनी थी। लेकिन जब अपेक्षित दौरे को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई तो लोगों में असमंजस पैदा हुआ।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि, यदि किसी कार्यक्रम या दौरे को लेकर स्थानीय स्तर पर ऐसी सूचनाएं प्रसारित होती हैं, जिनसे ग्रामीणों, छात्राओं और आम लोगों को नेता से अपनी समस्याएं रखने की उम्मीद बंधती है, तो बाद में पैदा हुई निराशा की जिम्मेदारी किसकी होगी?
क्या इसके लिए वह भोली-भाली जनता दोषी है, जो अपने जनप्रतिनिधि से मिलने की उम्मीद में घंटों खड़ी रहती है? क्या वे छात्राएं और बेटियां दोषी हैं, जो अपने सवालों के साथ अपने नेता का इंतजार करती हैं?
सवाल राहुल गांधी से भी, स्थानीय नेतृत्व से भी: रायबरेली सांसद के दो दिवसीय दौरे के बाद यह प्रसंग कई सवाल छोड़ गया है। स्थानीय लोगों का सवाल है कि, यदि जनप्रतिनिधि तक अपनी बात पहुंचाने के लिए ग्रामीणों और बेटियों को घंटों इंतजार करना पड़े और फिर भी संवाद का अवसर न मिल सके, तो लोकतंत्र में जनता और जनप्रतिनिधि के बीच संवाद की वह कड़ी कैसे मजबूत होगी?
यह सवाल केवल राहुल गांधी से नहीं, बल्कि स्थानीय कांग्रेस नेतृत्व से भी जुड़ा है—क्या स्थानीय स्तर पर जनता की वास्तविक समस्याओं और उनकी अपेक्षाओं को सांसद तक सही तरीके से पहुंचाया जा रहा है?
लालगंज की उन तीन बेटियों के हाथों में उठी माता रमाबाई आंबेडकर, सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की तस्वीरें अब एक सवाल बनकर सामने हैं।
सवाल सीधा है—बेटियां तीन घंटे इंतजार करती रहीं, सवाल लेकर खड़ी रहीं, नेता की गाड़ी भी कुछ क्षणों के लिए धीमी हुई… फिर भी संवाद क्यों नहीं हो सका?
और सबसे बड़ा सवाल—
आखिर इन बेटियों की उम्मीदों और इस पूरे घटनाक्रम का दोषी कौन है?
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