संकष्ट गणेश चतुर्थी, उपासना-श्री-सम्पन्न मातामह की निर्वाण तिथि, श्रद्धांजलि गोष्ठी आयोजित

मिर्जापुर: मातामह (नाना) पं सत्यनारायण मिश्र संस्कृत के शिक्षक के साथ धर्म और कर्मकांड के प्रकांड विद्वान थे । पूरी श्री दुर्गासप्तशती, रामचरितमानस के साथ निर्णय सिंधु उनकी जिह्वा पर विराजता था । किसी पर्व, तीज-त्योहार का शास्त्रोक्त निर्णय वे दिया करते थे । यहां तक कि काशी सहित पूर्वांचल का विद्वत समुदाय मातामह के निर्णय को मानता था । उनके निर्वाण तिथि पर नगर के तिवरानेतोला स्थित सत्यनारायण प्रिंटिंग प्रेस एवं  राष्ट्रसेवा विद्या वितान में श्रद्धाजंलि गोष्ठी आयोजित की गई । 
सन्त सा जीवन---
उनका जीवन संतों जैसा था । माताश्री सुमन पांडेय 2 साल की रही होंगी तभी मातामही (नानी) का निधन हो गया । वे माता के लिए पिता और माता दोनों हो गए । यानि अर्धनारीश्वर की भूमिका अदा की ।
साहित्य सदन पुस्तकालय में आते थे विद्वत समुदाय के लोग---
1906 में जन्में मातामह तिवराने टोला में रहते थे । उन दिनों तिवराने टोला में ही चौधरी बदरीनारायण 'प्रेमघन' की कोठी में भारतेंदु मंडल का जमघट लगता था । जिसमें आचार्य शुक्ल, मतवालाजी, बंग महिला, पं केदारनाथ पाठक सहित दर्जनों साहित्यकार उपस्थित होते थे । साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा, नागरी नीरद और आनन्द कादम्बिनी का प्रकाशन यहीं से होता था । जब मातामह कुछ बड़े हुए तो इन लोगों के बीच बैठने का उन्हें भी अवसर मिला । मातामह साहित्य सदन पुस्तकालय संचालित करने लगे ।
इन पुस्तकों का गहराई से अध्ययन पिताश्री डॉ भवदेव पांडेय ने किया ।---
आगे चलकर माता जी से विवाहोपरांत पिता डॉ भवदेव पांडेय ने वैदिक, पौराणिक और साहित्यिक ग्रन्थों, पुस्तकों का सम्यक् अध्ययन किया । घरेलू दायित्त्व का निर्वहन नानाश्री करते रहे और सिर्फ पठन-पाठन का काम पिताश्री करते रहे । बेसिक स्कूल की प्राइमरी से अध्यापन करते हुए उन्होंने स्नातकोत्तर तक अध्यापन की छलांग लगाई । उसके बाद लेखन में आए तो राष्ट्रीय पहचान बनाई ।
1987 में पंचभूत शरीर को छोड़ दिया --
18 जनवरी 1987 को नाना बीमार हुए । पेट में आतें चिपक गई थी । जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्साधीक्षक रहे अत्यंत व्यवहारिक एवं कुशल चिकित्सक रहे डॉ के एस राय जो बाद में स्वास्थ्य महानिदेशक हुए, ने उम्र को देखते हुए ऑपरेशन में असफ़लता की संभावना ज्यादा व्यक्त की । घर पर ही अस्पताल जैसा उपचार शुरू हुआ । नानाश्री ने ऑपरेशन से मना किया । वे सूर्य के उत्तरायण में शरीर छोड़ना चाह रहे थे । दो-तीन दिन के उपचार में कुछ ठीक हुए । 14 जनवरी को सूर्य उत्तरायण होने पर घर के आंगन में विधिवत गौदान किया । बड़ीमाता निवासी पं बालेश्वर पांडेय को गाय दिया । इसके बाद 18 जनवरी को रविवार का दिन था । सबको 10 बजे तक तीन दिन पहले से बुलाना शुरू किया । बहनें श्रीमती रश्मि द्विवेदी, श्रीमती पूर्णिमा मिश्रा, श्रीमती ऋचा त्रिपाठी तथा अनुज डॉ शिशिर पांडेय, उनकी पत्नी श्रीमती ज्योत्स्ना पांडेय आ गईं । मेरी पत्नी श्रीमती सावित्री पुत्रगण साकेत तथा विभाव जो छोटे छोटे थे एवं सबसे छोटे भाई यथार्थ यहीं थे । अंतिम समय में पास के ही पं चंदमौली द्विवेदी को बुलाया । सबको कुछ दक्षिणा दी और गीता सुनने की इच्छा व्यक्त की । बड़े भाई श्री वृजदेव पांडेय ने पहला अध्याय सुना कर जब अंत मे 'इति श्रीमद्भगवत गीता विषादयोगप्रथम अध्याय: सम्पूर्ण' का प्रयोग किया तो उन्हें मना किया कि पाठ के अंत में इति शब्द का प्रयोग करने से पाठ निष्फल हो जाता । अंत में इति की जगह 'ऊँ तत्सत' का प्रयोग होना चाहिए । मौके पर सूर्यप्रसाद पांडेय एवं जयराम शर्मा भी आ गए थे ।
    इसके बाद आंगन में गोबर लीपकर वहां ले चलने की इच्छा व्यक्त की । भस्म लगाया, तुलसी और गंगा जल लिया तथा आंखें बंद कर ली । सर्वाधिक आघात। माताश्री को हुआ । उनको लेकर तो नाना ने अपने जीवन की सारी आकांक्षाएं त्याग दी थीं । नाना के पूजा पाठ की अंत तक जिम्मेदारी माताजी ही निभाती थीं ।
   

                       सलिल पांडेय, मिर्जापुर

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