श्री हनुमान जी होते हैं साम्यवादी आंदोलन के प्रणेता प्रतीत

लाल देह लाली लसे,अरू धरि लाल लंगूर । 
बज्र देह दानव दलन,जय जय जय कपि सूर ॥
श्री हनुमानाष्टक के अंतिम दोहे के शब्दों पर विचार करने से हनुमान जी श्रमिक वर्ग के प्रतिनिधि प्रतीत होते हैं ।
1-लाल देह- मनुष्य जब श्रम करता है तभी उसका शरीर लालिमायुक्त होता हैं । आलसी, एसी में रहने वाला प्रायः बीमार रहता है। यहां देह का आशय सुगठित शरीर भी है  
2-लाली लसे- उसके लाल रक्त में काम करने की भावना लसी (समाई) रहती है । ऐसा व्यक्ति कामचोर नहीं होता ।
अरुधर लाल लंगूर- वह स्पाइसी (लजीज व्यंजन) के चक्कर में न पड़कर एवं लंगर की पंक्ति में बैठकर जो भी प्रसाद मिला, वह सिर माथे धारण कर लेता है और संतुष्ट रहता है ।
4-बज्र देह-इन कार्यों से पूर्ण संतुष्टि मिलती है और तब शरीर बज्र की तरह मजबूत रहता है ।
5-दानव-दलन- मजदूरों का हिस्सा डकारने वाले दानव प्रवृत्ति के लोगों के खिलाफ आंदोलन करते हैं ।
6-जय जय जय कपिसूर- फिर लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में उनकी जय जय जय होती है । यहां कपि का ध्वन्यार्थ क-कम्युनिज्म, प-पार्टी भी किया जा सकता है । इस तरह हनुमान जी से ही साम्यवादी आंदोलन की शुरुआत प्रतीत होती है । श्रीराम का साथ देने के लिए वानर, कोल-भील सबको संघठित करते हैं और अमेरिकी साम्राज्य की तरह सोना (भौतिकता) पर कब्जा तथा शस्त्रों के बल पर शक्तिशाली बने रावण की रीति-नीति को जलाकर भस्म करने में सफल रहते हैं ।
                        सलिल पांडेय, मिर्जापुर 

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