तीसरी आंख : अथ श्री मिर्चीकथा प्रारम्भ: किसीको मिर्ची लगे तो मैं क्या करूँ?

मिर्जापुर। बड़ा अजीब खेल है दुनियां और दुनियांदारी का !
दुनियां का मतलब ही है दो आंख हैं !
हर मामले में दो अखियांव का मामला- यह तो तीसरी अँखियाँ जब खुलेगी तो प्रलय होना ही होना है ।
इस प्रलय को ही कहेंगे- लाल मिर्ची !
    अब देखिए- आप किसी में अच्छाई देखते हैं तो होगा कि आप चापलूसी कर रहे हैं, तेल लगा रहे हैं ।
-किसी की समालोचना कर रहे हैं तो दूसरी आंख कहेगी कि-'लगता है कि कुछ जुगाड़ नहीं हुआ, इसलिए लिखा-पढ़ा-कहा जा रहा है !
      और हम किसी को कह रहे-'हुजूर ! आपका कोई टक्कर लेने वाला नहीं, दो टकियां, (हालांकि आजकल कोई सरकारी नौकरी दो टकियों की नहीं है) नौकरी छोड़ कर चुनाव लड़ जाइए तो आप सब की जमानत जब्त करा देंगे !
     -सरकार बहादुर, आप यदि 'नमक रोटी' नहीं सिर्फ नमके-नमक खिला दीजिए तो वह हल्दीराम के सोन-पापड़ी मिष्ठान्न की तरह मिठास भरा लगेगा और जूठन ख़िला दीजिए तो वह समुद्र-मंथन में निकले अमृत जैसा लगेगा ।
    -मेरे मालिक ! यदि आप मेरे 'उठापटक' के चलते और 'लंगीमार' कार्यक्रम में 'साक्षात नारायण' की तरह मुख्य अतिथि बन जाइए तो अगली और पिछली सात-सात पीढ़ी यानि भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास की तरह 14 पीढ़ी धन्य हो जाएगी !
      ये सब कथन हम अलापेंगे तो हम इसे वेदमंत्र कहेंगे ।
-और हम किसी को गाली देते हैं तो हम उसे 'गूगल-ज्ञान' साबित करेंगे । जिसे आजकल बहुत प्रमाणिक माना जा रहा है । हालांकि गूगल-ज्ञान में कभी कभी अज्ञान भी झलकता है ।
     यह है आपके और हमारे कथन ! खैर यह जमाने का दस्तूर है ।
      मेरा बेटा गलत काम करे तो मजबूरी, रिश्वत लें तो बुद्धिमान और पड़ोसी का हो तो पापी, घूसखोर और अज्ञानी है ।
धन्य है दुनियां और दुनियांदारी !
      ।। इति मिर्ची कथा समाप्त: ।।
                        सलिल पांडेय, मिर्जापुर
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