कजली विधा में अजिता का सम्मान है विन्ध्यवासिनी के श्रीचरणों की अर्चना

13 फरवरी को राज्यपाल देंगी अकादमी सम्मान
मिर्जापुर । द्वापर युग में कर्कश अट्टहास के जरिए ध्वनि प्रदूषण  के खिलाफ योगेश्वर कृष्ण की अग्रजा (बड़ी बहन) योगमाया ने आकाश से कजली गीत के साथ जिस विंध्य-पर्वत पर आकर इसे उपकृत किया, उसी कजली गीत से 'दशमी रामनगर की भारी कजरी मीरजापुर सरनाम' मुहाबरा गढ़ा गया ।
 आकाश में  योगमाया  के धरती पर अवतरण के वक्त देवमण्डल ने देव-रथ के साथ दिए गए इस गीत के कारण आद्या शक्ति मां विन्ध्यवासिनी का नामकरण भी कज्जला देवी के रूप में धर्मशास्त्रों ने कर दिया । युग बीतता गया और कज्जला देवी की स्तुति में कजली गायी जाने लगी । इसे बहुतों ने गाया लेकिन पहली बार उत्तर प्रदेश सरकारने लोकगीत गायिका श्रीमती अजिता श्रीवास्तव के गायन को सम्मान के युक्त समझा और उन्हें सम्मानित करने का निर्णय लिया ।
13 फरवरी को राज्यपाल करेंगी सम्मानित---
यहां के आर्यकन्या इंटर कालेज में प्रवक्ता पद से सेवानिवृत्त श्रीमती अजिता श्रीवास्तव को संगीत नाटक अकादमी से सूचना आई कि 13 फरवरी को राज्यपाल श्रीमती आनन्दी बेन उन्हें लखनऊ में अकादमी सम्मान देंगी तो श्रीमती श्रीवास्तव से ज्यादा कजली गीत के श्रोता, संरक्षणकर्ता, आम जनता झूम इसलिए उठीं कि यह श्रीमती अजिता श्रीवास्तव का नहीं बल्कि मां विन्ध्यवासिनी के श्रीचरणों का सम्मान है ।
तमाम अवरोधों को कजली गीत से दूर करती बनी 'अ-जिता'---
श्रीमती अजिता श्रीवास्तव के बुलंदी के शिखर पर कजली-पताका फहराने में ऐसा नहीं कि अवरोध न आए हों लेकिन अपनी लगन, वाराणसी के गुरु घराने पं अमरनाथ मिश्र एवं पं एम पी कालर्पित के अमरता के आशीर्वाद के साथ अपनी साधना में वे समर्पित रहीं । उन्हें 'कजली-मल्लिका' जैसी उपाधियां भी मिलीं । श्रीमती अजिता एक तरह से कजली की पर्याय बन गई हैं।
                      -सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ