जनता-दर्शन की महत्ता: रामायण ग्रन्थ के रचयिता आदिकवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा

रामायण ग्रन्थ के रचयिता आदिकवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा वैभवशाली राष्ट्र तथा समाज के लिए राजा (शासक एवं प्रशासक) को क्या क्या करना चाहिए, इस संबन्ध में 76 श्लोकों की रचना की गई है । जनता दर्शन को ऋषि ने महत्वपूर्ण बताया है । 
     कच्चिद् दर्शयसे नित्यं मानुषाणाम् विभूषितं ।
उत्थायोत्थाय पूर्वाह्ने राजपुत्र महापथे
(अयोध्याकांड, सर्ग 100, श्लोक 51)
      अर्थ-राजकुमार ! क्या तुम प्रतिदिन पूर्वाह्न काल में वस्त्राभूषणों से विभूषित होकर प्रधान सड़क पर जा-जाकर नगरवासी मनुष्यों को दर्शन देते हो ?
    यह प्रसंग उस वक्त का है जब श्रीराम वनगमन कर गए हैं और भरत उन्हें वापस लेने आए हैं। श्रीराम और भरत का लंबा संवाद नीतिपरक और शास्त्रोक्त है ।
    इसी वार्ता के क्रम में श्रीराम ने जनता-दर्शन की महत्ता बताई । राज्य को वैभवशाली बनाने के लिए राजा (अब शासक/प्रशासक) को प्रतिदिन जनता से संवाद करने को अनिवार्य बताया है ।
     अन्य अनेक श्लोकों में श्रीराम ने कहा कि, राजा को न बहुत ढीला होना चाहिए ताकि अनुशासन शिथिल न हो, अधीनस्थ स्वेच्छाचारी हो जाएं और न इतना कठोर कि अधीनस्थ और जनता अपनी बात कह ही न सकें। 
     इसी क्रम में राजा के माध्यम से हर घर के मुखिया को सुदृढ अर्थव्यवस्था का भी ज्ञान श्रीराम ने दिया है । आने वाले कल के लिए सुदृढ अर्थ-समृद्धि, निवेश और व्यय का प्राक्कलन पूर्व रात्रि के पहले पहर में कर लेना चाहिए ।
                       सलिल पांडेय, मिर्जापुर©

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ