भगवान श्रीराम द्वारा लोकापवाद के चलते सीता के परित्याग को स्थूल अर्थों में न देखकर यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो श्रीराम के इस कदम में सर्वप्रथम नारी सशक्तिकरण, आधुनिक सूचना तथा प्रौद्योगिकी एवं कृषि आधारित जीवन के विविध रूप दिखाई देते हैं ।
इन व्याख्याओं को संक्षिप्त में वर्णित तो नहीं किया जा सकता । सिर्फ सीता-परित्याग प्रसंग के लिए सीताचरित मानस की जरूरत होगी लेकिन इस घटनाक्रम में लोकहित के जो भाव सन्निहित हैं, उसे सूक्तिवत प्रस्तुत करते हुए अपना मत रख रहा हूँ । आवश्यक नहीं सब सहमत हो ।-सलिल पांडेय
पुरुष और स्त्री : प्रतिबिम्ब दो पर स्रोत एक---
गोस्वामी तुलसीदास ने मानस के प्रारम्भ बालकाण्ड के मंगला चरण में 'भवानीशंकरौ बंदे' तथा कालिदास ने रघुवंश में 'जगतः पितरौ वंदे पार्वती परमेश्वरौ' के जरिए पत्नी और पति को एक इकाई ही माना है । श्रीराम के त्रेता के बाद श्रीकृष्ण की महिमा में लिखे भागवतपुराण में राधा का कहीं उल्लेख नहीं है । जहां श्रीकृष्ण हैं, वहां उनकी आह्लादिनी शक्ति राधा अपने आप मौजूद हैं ।
सीता परित्याग : स्थितिप्रज्ञ-साधना का अवसर---
श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण तम, रज और सत से ऊपर स्थितिप्रज्ञ साधना का उपदेश अर्जुन को देते हैं जो 'सूखे-दुःखे समे कृत्वा लाभाSलाभौ जया जयो' से परिलक्षित होता है । श्रीराम सीता को स्थितिप्रज्ञ बनाना चाहते थे । वे स्थितिप्रज्ञ जनक की पुत्री है । उस श्रेष्ठता तक पहुंचाने का वाल्मीकि आश्रम में जाना नितान्त आवश्यक था ।
त्रिकोणीय अभिलाषाएं- गायत्री मंत्र का प्रथम चरण ही 'भू: भुव: स्व:' जीवन को त्रिस्तरीय दिशाओं से ऊपर लाकर ऊर्जावान का मार्ग दिखाता है । विंध्यधाम का सर्वाधिक वृहद महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती का त्रिकोण भी ज्ञान, इच्छा और क्रिया का त्रिकोण है । श्रीराम ज्ञान के प्रतीक, माता सीता इच्छा की तथा लक्ष्मण क्रिया के प्रतीक हैं । ज्ञान की साधनात्मक क्रिया के जरिए इच्छाओं को जागतिक (भौतिक) न बनाकर स्थितिप्रज्ञ तक ले जाने के लिए सीता का राजस परिवेश से हटना आवश्यक भी था ।
लोक जीवन के लिए कृषि--
सीता का अर्थ कृषिभूमि की जुताई के वक्त हल के नोक से पड़ने वाली रेखा है । उसमें बीजमंत्रों का आरोपण किया जाना पालनकर्ता विष्णु का रूप है जो साक्षात् श्रीराम हैं । इस प्रक्रिया के बाद कृषि भूमि से उत्पादित अनाज को सिर्फ राजमहल के लिए नहीं बल्कि जन-जन के लिए क्षितितत्व के रुप में प्रदान करना आवश्यक है । इसलिए श्रीराम राजसत्ता से दूर आश्रम तक कृषि की महत्ता के क्रम में वाल्मीकि आश्रम में सीता को भेजते हैं । वाल्मीकि जी कृषि, पर्यावरण और प्रकृति के अद्भुत ज्ञाता थे जो उनके रामायण से प्रतीत होता है ।
कुटिल साधु रावण का स्पर्शदोष सिद्ध साधु से ही सम्भव--
सीताजी को रावण छद्म साधु के रूप में हर ले गया था । लंका के नकारात्मक परिवेश में रखा । उस परिवेश जनित प्रभावों को समाप्त करने के इरादे से श्रीराम ने उन्हें वाल्मीकि आश्रम में भेजा ।
ऋषि सर्वोच्च न्यायालय होते थे---
सत्युग से लेकर द्वापर तक ऋषि को देवताओं से अधिक अधिकार प्राप्त थे । देवता, राजा सबको ऋषि के जरिए धर्मसत्ता दंड देती थी । श्रीराम ने लंका विजय के बाद सीता की अग्निपरीक्षा ली थी । यह कार्यपालिका का विधान था । इस अग्निपरीक्षा में सीता ने कड़े प्रतिवाद भी किए श्रीराम से जो वाल्मीकि जी के रामायण युद्धकाण्ड के सर्ग 115 से 118 तक के विभिन्न श्लोकों में अंकित है । लेकिन वाल्मीकि आश्रम में जाते वक्त सीता ने कोई प्रतिवाद नहीं किया । बल्कि आश्रम में कुछ दिन रहने की इच्छा व्यक्त की थी जो वाल्मीकि रामायण के 42वें सर्ग के 31वें श्लोक में वर्णित है ।
आधुनिक विज्ञान---
ब्रह्मांड के रचयिता श्रीराम है तो सीता उनकी बहुआयामी इच्छा शक्ति के रूप में कम्प्यूटर साइंस में तरंगों के जरिए ज्ञान को प्रवाहित करने वाली साफ्टवेयर हैं । ब्रह्मांड के निर्माता श्रीराम के स्वरूपों को जानने के लिए धरती पर स्थित ऋषि स्वरूप वैज्ञानिकों के संरक्षण में इस विज्ञान को लोकहितार्थ सुरक्षित रखा गया। आधुनिक दृष्टि से भी उच्च वैज्ञानिक खोज रिसर्च सेंटरों से ही संचालित होते हैं न कि राजसत्ता से ।
इस प्रकार सीता के निर्वासन को आज के सन्दर्भों में देखा जाना चाहिए । आस्था के भाव से तो दुर्वासा ने दशरथ को तथा भृगु ऋषि ने विष्णु को श्राप दिया था जिसके कारण पुत्र वियोग दशरथ को झेलना पड़ा तथा पत्नी वियोग श्रीराम को ।
सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
©लेख के किसी अंश का बिना लेखक की अनुमति के प्रयोग करना कापीराइट ऐक्ट का उल्लंघन होगा ।
इन व्याख्याओं को संक्षिप्त में वर्णित तो नहीं किया जा सकता । सिर्फ सीता-परित्याग प्रसंग के लिए सीताचरित मानस की जरूरत होगी लेकिन इस घटनाक्रम में लोकहित के जो भाव सन्निहित हैं, उसे सूक्तिवत प्रस्तुत करते हुए अपना मत रख रहा हूँ । आवश्यक नहीं सब सहमत हो ।-सलिल पांडेय
पुरुष और स्त्री : प्रतिबिम्ब दो पर स्रोत एक---
गोस्वामी तुलसीदास ने मानस के प्रारम्भ बालकाण्ड के मंगला चरण में 'भवानीशंकरौ बंदे' तथा कालिदास ने रघुवंश में 'जगतः पितरौ वंदे पार्वती परमेश्वरौ' के जरिए पत्नी और पति को एक इकाई ही माना है । श्रीराम के त्रेता के बाद श्रीकृष्ण की महिमा में लिखे भागवतपुराण में राधा का कहीं उल्लेख नहीं है । जहां श्रीकृष्ण हैं, वहां उनकी आह्लादिनी शक्ति राधा अपने आप मौजूद हैं ।
सीता परित्याग : स्थितिप्रज्ञ-साधना का अवसर---
श्रीमद्भगवतगीता में श्रीकृष्ण तम, रज और सत से ऊपर स्थितिप्रज्ञ साधना का उपदेश अर्जुन को देते हैं जो 'सूखे-दुःखे समे कृत्वा लाभाSलाभौ जया जयो' से परिलक्षित होता है । श्रीराम सीता को स्थितिप्रज्ञ बनाना चाहते थे । वे स्थितिप्रज्ञ जनक की पुत्री है । उस श्रेष्ठता तक पहुंचाने का वाल्मीकि आश्रम में जाना नितान्त आवश्यक था ।
त्रिकोणीय अभिलाषाएं- गायत्री मंत्र का प्रथम चरण ही 'भू: भुव: स्व:' जीवन को त्रिस्तरीय दिशाओं से ऊपर लाकर ऊर्जावान का मार्ग दिखाता है । विंध्यधाम का सर्वाधिक वृहद महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती का त्रिकोण भी ज्ञान, इच्छा और क्रिया का त्रिकोण है । श्रीराम ज्ञान के प्रतीक, माता सीता इच्छा की तथा लक्ष्मण क्रिया के प्रतीक हैं । ज्ञान की साधनात्मक क्रिया के जरिए इच्छाओं को जागतिक (भौतिक) न बनाकर स्थितिप्रज्ञ तक ले जाने के लिए सीता का राजस परिवेश से हटना आवश्यक भी था ।
लोक जीवन के लिए कृषि--
सीता का अर्थ कृषिभूमि की जुताई के वक्त हल के नोक से पड़ने वाली रेखा है । उसमें बीजमंत्रों का आरोपण किया जाना पालनकर्ता विष्णु का रूप है जो साक्षात् श्रीराम हैं । इस प्रक्रिया के बाद कृषि भूमि से उत्पादित अनाज को सिर्फ राजमहल के लिए नहीं बल्कि जन-जन के लिए क्षितितत्व के रुप में प्रदान करना आवश्यक है । इसलिए श्रीराम राजसत्ता से दूर आश्रम तक कृषि की महत्ता के क्रम में वाल्मीकि आश्रम में सीता को भेजते हैं । वाल्मीकि जी कृषि, पर्यावरण और प्रकृति के अद्भुत ज्ञाता थे जो उनके रामायण से प्रतीत होता है ।
कुटिल साधु रावण का स्पर्शदोष सिद्ध साधु से ही सम्भव--
सीताजी को रावण छद्म साधु के रूप में हर ले गया था । लंका के नकारात्मक परिवेश में रखा । उस परिवेश जनित प्रभावों को समाप्त करने के इरादे से श्रीराम ने उन्हें वाल्मीकि आश्रम में भेजा ।
ऋषि सर्वोच्च न्यायालय होते थे---
सत्युग से लेकर द्वापर तक ऋषि को देवताओं से अधिक अधिकार प्राप्त थे । देवता, राजा सबको ऋषि के जरिए धर्मसत्ता दंड देती थी । श्रीराम ने लंका विजय के बाद सीता की अग्निपरीक्षा ली थी । यह कार्यपालिका का विधान था । इस अग्निपरीक्षा में सीता ने कड़े प्रतिवाद भी किए श्रीराम से जो वाल्मीकि जी के रामायण युद्धकाण्ड के सर्ग 115 से 118 तक के विभिन्न श्लोकों में अंकित है । लेकिन वाल्मीकि आश्रम में जाते वक्त सीता ने कोई प्रतिवाद नहीं किया । बल्कि आश्रम में कुछ दिन रहने की इच्छा व्यक्त की थी जो वाल्मीकि रामायण के 42वें सर्ग के 31वें श्लोक में वर्णित है ।
आधुनिक विज्ञान---
ब्रह्मांड के रचयिता श्रीराम है तो सीता उनकी बहुआयामी इच्छा शक्ति के रूप में कम्प्यूटर साइंस में तरंगों के जरिए ज्ञान को प्रवाहित करने वाली साफ्टवेयर हैं । ब्रह्मांड के निर्माता श्रीराम के स्वरूपों को जानने के लिए धरती पर स्थित ऋषि स्वरूप वैज्ञानिकों के संरक्षण में इस विज्ञान को लोकहितार्थ सुरक्षित रखा गया। आधुनिक दृष्टि से भी उच्च वैज्ञानिक खोज रिसर्च सेंटरों से ही संचालित होते हैं न कि राजसत्ता से ।
इस प्रकार सीता के निर्वासन को आज के सन्दर्भों में देखा जाना चाहिए । आस्था के भाव से तो दुर्वासा ने दशरथ को तथा भृगु ऋषि ने विष्णु को श्राप दिया था जिसके कारण पुत्र वियोग दशरथ को झेलना पड़ा तथा पत्नी वियोग श्रीराम को ।
सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
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