पृथ्वी से उत्पन्न हुई मूर्ति, पांडव पूजित हैं मां अहोरवा भवानी।। Raebareli news ।।

रजनीकांत अवस्थी
महराजगंज/रायबरेली: अमेठी जनपद के सिंहपुर ब्लाक मुख्यालय के निकट इन्हौना-रायबरेली मार्ग पर रायबरेली से 41 किमी पर स्थित मां अहोरवा भवानी पर भक्तों की अटूट श्रद्धा है। प्रत्येक सोमवार यहां विशाल मेला लगता है। चैत्र और क्वार की नवरात्र में यहां विशेष आयोजन होते हैं। भक्त मां की पूजा-अर्चना के साथ-साथ मंदिर की परिक्रमा करते हैं। यहां की मान्यता है कि, मां के चरणों के जल से असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।
     आपको बता दें कि, क्षेत्र तथा दूरदराज से आने वाले दर्शनार्थियों में मां अहोरवा भवानी के प्रति अटूट श्रद्धा है। भक्तों को मां में इतना विश्वास है कि, वह कार्य सिद्धि के लिए मां के दर्शन की फेरियां मान लेते हैं। इसके बाद मां के दरबार की पांच या सात सोमवार फेरी करते हैं। फेरी के अंतिम सोमवार को कन्या भोज या ब्राम्हणों को भोजन खिलाकर फेरी का समापन करते हैं। आषाढ़ मास में पड़ने वाले सोमवारों को यहां भीड़ का आलम यह होता है कि, भक्तों को प्रसाद चढ़ाने में कई घंटों का समय लग जाता है।
   
  अव्यवस्था
इतने विशाल मंदिर परिसर में डेढ़ दर्जन कुएं तथा दो बड़े सगरा भी हैं, जो पूरी तरह अव्यवस्था का शिकार हैं। भक्त यदि स्नान करना चाहें तो या तो नहर में स्नान करें या फिर इंडिया मार्का हैंडपंपों का सहारा लें। महिलाओं को स्नान के लिए यहां कोई विशेष व्यवस्था नहीं है।
   मां अहोरवा ने सबसे पहले अर्जुन को हुए थे दर्शन
क्षेत्रीय क्षत्रियवंश गांडीव का क्षेत्र 360 गांवों का तालुका माना जाता है। इस वंश की प्रमुख देवी का दर्जा मां अहोरवा भवानी को प्राप्त है। अर्जुन के गांडीव के नाम से इस क्षेत्र का नाम पड़ा। माना जाता है कि, पांडव जब वनवास के दौरान अज्ञातवास का समय बिता रहे थे, तो वे इसी क्षेत्र में काफी समय रहे। एक दिन जंगल में जब शिकार के लिए अर्जुन निकले, तो वहां माता के दर्शन हुए। वापस लौटकर अर्जुन ने माता के विषय में इसकी जानकारी भाईयों को दी। तो सभी ने उनकी पूजा की। माना जाता है कि, यह जगह उसी विराट नगरी के अधीन होगी, जिसका उल्लेख महाभारत में किया गया है। लोग कहते हैं कि, पांडवों ने मां का मंदिर भी बनवाया था, लेकिन समय के साथ मंदिर व प्रतिमा विलुप्त हो गयी। कालांतर में अहोरवा नामक एक पाल बिरादरी के व्यक्ति ने पुन: स्वप्न में देखने पर मां की मूर्ति की खोज की थी। जिसके चलते ही मां अहोरवा भवानी नाम पड़ा।
यहां पर पूरी होती हैं भक्तों की मुराद
मां के दर्शनर्थियों की बात करें, तो सैकड़ों किमी की दूरी तयकर गैर जनपद के भक्त मां के दर्शन के लिए आते हैं। स्थानीय भक्तों की बात करें, तो सुबह और शाम दोनों पालियों में भक्त मां के मंदिर में पूजा-अर्चना करने जाते हैं। महराजगंज के रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुभाष पांडेय बताते है कि, मां के दर्शन मात्र से ही भक्त के सारे पाप धुल जाते हैं।
      वे बताते हैं कि, 'मां की मूर्ति प्राकृतिक है। वह दिनभर में तीन रूप परिवर्तित करती है। सुबह बाल रूप तो दोपहर में युवावस्था तथा शाम को प्रतिमा का वृद्ध रूप होता है। मां की मूर्ति पृथ्वी से उत्पन्न है। उसका कहीं से किसी प्रकार का निर्माण नहीं कराया गया है।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ