चरैवेति मजदूर चरैवेति

पंकज प्रशून
रायबरेली: मजदूर चला जा रहा है। जिस होटल की इमारत उसने बनाई, उसमें ठहर नहीं सकता था। जो फ्लैट बनाये थे उसमे रुक नही सकता था। जो हॉस्पिटल उसने बनाया उसमें इलाज करवाने के पैसे भी नहीं थे।  हाँ  कुछ उसका है तो पटरियां हैं,  सड़क है। सड़क उसकी है वह सड़क पर है। उसका जीवन भले पटरी पर न आ पाया हो लेकिन वह ज़रूर आ गया है।
     मजदूर  को बहुत दूर जाना है। उसने सर पर बोझ भी है। लेकिन वह उसकी जिंदगी के बोझ से कम वजनी है। जिस शहर में वह था वह उसका था ही नहीं, जिस गांव को जा रहा है, उसके लिए विदेशिया है। उसे संदेह होता है कि वह देशवासी है या प्रवासी है।
     हर आदमी का एक सपना होता है। जाहिर है कि मज़दूर का भी होता ही होगा। वह अक्सर  दो जून की दाल  रोटी  का सपना देखता था। आप कहेंगे यह भी कोई सपना होता है। देखना ही है तो देखे आलीशान घर,         चमचमाती गाड़ी, फार्म हाउस. लेकिन मखमली बेड के सपनों और  फुटपाथ  के सपनों में अंतर होता है। अगर किसी मजदूर ने गाड़ी का सपना देख भी लिया तो वह जानता है कि एक गाड़ी आएगी और उसे कुचल कर निकल जाएगी साथ में उसके सपनों को भी। 
      वह लगातार गतिशील है।रास्ते में  टीवी के संवाददाता मिल रहे हैं।  कैमरे कभी  धंसी आंखों पर फोकस होते हैं कभी पैरों में पड़ी गांठों पर। वह पूछता है कितने किलोमीटर चल चुके, अभी कितने और चलना है। शायद उस पत्रकार को नहीं पता वह एक दिहाड़ी मजदूर है। 12 घन्टे काम करने वाला। वह कहां गिनता है कि कितने फावड़े चला चुका, कितने और चलाने हैं।वह तो न्यूनतम मजदूरी में अधिकतम मेहनत करने वाला प्राणी है। पत्रकार उसके बीबी बच्चे की दशा की बात करता है। आंसू नहीं आते हैं तो मां की जर्जर तबियत का सवाल पूछता है।
      उसका मकसद है कि येन केन प्रकारेण वह रो दे और टीआरपी का कारण बन जाये। वह रोया तो नहीं लेकिन निरीह नज़रों से उसकी ओमनी वैन को देख रहा था। सौ सौ किलो की बोरियां लिफ्ट करने वाले कि इतनी हैसियत ही कहाँ कि किसी से लिफ्ट मांग सके। 
      रास्ते मे किसी धर्मात्मा ने उसको रोटी देते हुए फ़ोटो खिंचवाई। वह असमंजस में था कि फ़ोटो खिंचवाने के लिए रोटी दी  या रोटी  की वजह से फ़ोटो खिंचवाई। वैसे भी मजदूर को विचारधारा के बजाय रोटी से  मतलब था। उसने तो  पचास रुपये और चार पूड़ी की एवज में एक रैली में इन्द्रा गांधी जिन्दावाद के नारे लगाए थे तो दो पैसे ज्यादा लेकर दूसरी पार्टी के लिए दिन भर  बाबासाहेब अमर रहे बोलता रहा। उसे लगता है वह व्यक्ति नहीं लोभी भीड़ है। ऐसी भीड़ जो कम  पैसे के लोभ में गाड़ियों के गेट पर लटक जाती है, राशन की लम्बी लाइन में खड़ी हो जाती है, जनरल डिब्बे के शौचालय मे घुस जाती है। वह  भी कितना लोभी भी था, उसने  विधायक जी को बेटी की शादी में इसलिए बुलाया था  जिससे उसे एक हजार एक रुपये  का लिफाफा हासिल हो सके।  बेटी की शादी में इतना कर्ज हो गया था कि उसके ससुराल जाते ही  उसे शहर जाना पड़ा। लेकिन उसकी सारी कमाई महज ब्याज चुकाने मे ही खप जाती है। वह विदेश भी नहीं भाग सकता। उसने सोच लिया है कि अबकी वह कर्ज माफी के बदले वोट का झांसा देगा। भोले भाले नेता उसके झांसे में आ गए तो उसका बिगड़ा काम बन सकता है। नहीं बना तो सरकार तो बनेगी ही।  
      मंजिल अभी दूर है। सुनाई पड़ रहा सरकार ने उसके लिए श्रमिक स्पेशल चलाई है, वह गदगद हो गया कि उसको स्पेशल तो माना गया। यह सच है कि वह स्पेशल रहा है सहित्यकारों के लिए. कथाकारों ने उसके जीवन पर उपन्यास लिख डाले हैं। कवियो ने  उसकी  पसीने की बूंदों पर महाकाव्य रच डाले हैं। वह आज भी रच रहा है-' ऊपर रवि नीचे धरा तपती बारम्बार, एक स्वेद कण हो रहा मोती मोल हज़ार। वह कभी उपन्यास का पात्र बन कभी उपहास का। मजदूर दस दिन में उतना नही कमा पाता जितना दस मिनट उसकी पीड़ा गाने वाला कमा लेता है। कितने ही लोग उसकी पीड़ा पर भाषण देकर नेता बन गए,मंत्री बन गए। मजदूर को राजनीति से पीड़ा नही होती लेकिन उसे  पीड़ा की राजनीति देख कर दुख होता है। 
     वह वापस गांव जा रहा है। उसकी  आंखों की तरह उसकी जमीन भी पथरीली हो चुकी है। यह फिर भी खुश है। सुन रखा था कि पत्थर में तो भगवान होता है। कौन कहता है वह गरीब होता जा रहा है। वह तो भगवान के और भी करीब होता जा रहा है।  सरकार  ने भी उसकी  भलाई के लिए क्या -क्या नहीं किया। प्राइमरी शिक्षा की हालत बद से बदतर कर दी जिससे इसका मन  मन मजदूरी से न भटके। यह मकान की नींव मजबूत  बनाये इसलिए शिक्षा की नींव कमजोर ही रहने दी।.यह धरती से जुड़ा रहे. मिट्टी को ओढ़े बिछाए, फिर मिट्टी में ही मिल जाए इसलिए इसको धरतीपुत्र की उपाधि दी गई।  उसके नाम से अंतराष्ट्रीय दिवस भी मनाया जाने लगा। पिछले साल उसके मालिक ने माला पहनाकर मान दिया था लेकिन एक दिन तबियत खराब हुई तो  मानदेय काट लिया था।
     वह बैठ के सुस्ता भी नही रहा। उसने चरैवेति -चरैवेति का सिद्धांत किसी संत ने सुन रखा था-' जो बैठा  रहता है उसका भाग्य भी बैठ जाता है, जो खड़ा होता है, उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है लेकिन जो चलता रहता है उसका भाग्य भी चलता रहता है। इसीलिए वह चलता जा रहा है। शाम ढल चुकी थी। उसको जय जवान जय किसान का नारा याद आ रहा है। जवान तो सरहद पर देश की अस्मिता की रक्षा करता है, लेकिन यह तो परिवार की भी नहीं कर पाया था। वह दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद होता है तो इक्कीस तोपों की सलामी मिलती है और इसके लिए इक्कीस रुपये का कफ़न मुहाल हो जाता है । उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। तभी  तेज रफ्तार गाड़ी ने उसको टक्कर मार दी। चालक नशे में था । इससे पहले की वह होश में आता मजदूर हमेशा के लिए बेहोश हो चुका था। 
      सुना है कि, उसके परिवार को तीन लाख का मुआवजा मिल गया है। लोन भी हो सकता है माफ हो जाये सच है, चलते रहने से भाग्य चलता रहता है..

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