◆कुलबुलाहट भरा मन,
जीर्ण शीर्ण तन,
पारिवारिक सभ्यता का भारी लबादा,
महँगाई के दो पाटों के बीच,
पिस रहा है हिना की तरह,
शायद रंग आ जाए ।
◆दफ्तर से घर की दौड़,
पूरी न हो पाई कि आ गया मोड़,
वहाँ कलम घिसता है,
यहां पर नाक,
शायद चमक आ जाए,
कार्बन के टुकड़े सी,
दमक आ जाए ।
◆घर की कलह ले पहुँची,
निर्गुट आन्दोलन,
भय का समापन,
निरस्त्रीकरण,
नई शिक्षा प्रणाली,
तक पहुंचाएगा,
कम्प्यूटरीकरण ।
◆Written by ~ कमल बाजपेई
जीर्ण शीर्ण तन,
पारिवारिक सभ्यता का भारी लबादा,
महँगाई के दो पाटों के बीच,
पिस रहा है हिना की तरह,
शायद रंग आ जाए ।
◆दफ्तर से घर की दौड़,
पूरी न हो पाई कि आ गया मोड़,
वहाँ कलम घिसता है,
यहां पर नाक,
शायद चमक आ जाए,
कार्बन के टुकड़े सी,
दमक आ जाए ।
◆घर की कलह ले पहुँची,
निर्गुट आन्दोलन,
भय का समापन,
निरस्त्रीकरण,
नई शिक्षा प्रणाली,
तक पहुंचाएगा,
कम्प्यूटरीकरण ।
◆Written by ~ कमल बाजपेई

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