बंगाली माता के महाप्रस्थान से विन्ध्यपर्वत भी है गुमसुम

अचानक हुई बूंदाबांदी वर्षा के नहीं देवलोक में स्वागत के लिए जलाभिषेक की बूंदे हैं
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मिर्जापुर । कोलकाता से लगभग 50 साल पहले विन्ध्यपर्वत के आरण्यक परिवेश में आकर अपनी आराधना से मां दुर्गा को प्रसन्न कर लेने वाली साधिका बंगाली माता अरण्यषष्ठी (28 मई) के दिन प्रकृति के पंच तत्वों में समाहित होकर खुद के पार्थिव शरीर को विस्तार दे दिया तथा चेतना शक्ति को अनन्त में समाहित कर दिया । वह साधना के ऊर्ध्व शिखर पर थी । सांसारिक जगत से याचकता नहीं बल्कि दानशीलता के साथ वह संबन्ध रखती थीं ।
40 साल की उम्र में मां की शरण में- बंगाली माता इन दिनों 90 वर्ष की रही होंगी । 40 की उम्र में आकर दुर्गाचालीसा पढ़ना शुरू किया तो दुर्गा के सहस्रों रूप से वे विज्ञ हुईं । 
बंगला और अंग्रेजी भाषा की पुस्तकें पढ़ती थी- बंगाली माता स्वामी रामकृष्ण एवं स्वामी विवेकानन्द के जीवन और साहित्य की अध्येता थीं । लगभग 7 वर्ष पहले उन्हें विंध्याचल महिमा पर आधारित अपनी पत्रिका 'विंध्यप्रसाद' जब मैंने भेंट की तो बोली-मैं तो बंगला और अंग्रेजी ही पढ़ पाती हूं। उन्होंने स्वामी रामकृष्ण के उपदेशों से संबंधित पुस्तक छपवाने की इच्छा प्रकट की थी । एक वर्ष बाद पुनः उन्होंने यही इच्छा प्रकट की । इससे स्पष्ट जाहिर हुआ कि उनके आदर्श स्वामी रामकृष्ण थे ।
विनम्रता की अवतार- बंगाली माता मातृत्व-भाव मे रहती थीं । जो कोई भी उनके पास जाए तो उसे अपने हाथ से कुछ बना कर खिलाने के लिए कहती थीं । वे अकेले अष्टभुजा की पहाड़ी पर ब्रह्म-मुहूर्त से ही पूजन-अर्चन में लग जाती थीं । वे अपने हाथों से ही पूजन की तैयारी करती थीं । उनकी हर साँसों में और अहर्निश चिंतन में मां दुर्गा ऐसे आकर बसी कि उनका सिर जैसे ब्रह्मांडकी तरह घना बन गया हो । जबरदस्त घने और कमर से नीचे तक आते बाल ज्ञान को धरती की ओर प्रेषित करते प्रतीत हो रहे थे ।
चलते-चलते कहा प्रसाद लेकर जाओ- किसी को ड्योढ़ी से खाली न लौटाने की उनकी इच्छा रहती थी । चलते-चलते कहा-'बैठो, चाय बनाती हूं, पी के जाओ ।' इस पर क्षमा मांगते हुए जब मैंने कहा कि यह तो मेरे लिए गुनाह हो जाएगा तब प्रसाद में पेड़ा दिया, साथ में पत्नी का नाम पूछ कर एक बहुत ही उच्चकोटि की साड़ी दी । इस तरह वे हमेशा दाता-भाव में ही रहना चाहती थी ।
विंध्यपर्वत गुम-सुम सा दिख रहा- बंगाली माता के महाप्रस्थान की तैयारी की जैसे भनक देव-शक्तियों को हुई तो प्रकृति में हलचल बुधवार, 27 मई की रात से ही दिखने लगी। अचानक गर्म मौसम में ठंडी हवाओं के साथ ज्येष्ठ की रोहिणी नक्षत्र की आंखों से आंसू टपकने लगे। लोग समझे बून्दा-बांदी हो रही है।  हकीकत है कि उनके आगमन पर देवलोक में जल-प्रक्षालन हो रहा था लिहाजा उसकी कुछ बूंदे धरती पर आ गिरी ।
                    सलिल पांडेय, मिर्जापुर
(यह लेखक के साथ दो बार की मुलाकात के आधार पर हुई अनुभूति का अंश है)
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