कठोरता से तरलता की यात्रा का पर्व है गंगा-दशहरा

कैसे करें गंगा का पूजन
कर्मकांड पक्ष
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मिर्जापुर । ज्येष्ठ शुक्ल की दशमी तिथि तिथि पर हस्त नक्षत्र, चन्द्रमा कन्या राशि में, सूर्य वृष राशि में और दिन मंगलवार को मां गंगा का अवतरण पृथ्वी पर हुआ था । इस दिन को गंगा-दशहरा कहा जाता है। शस्त्रों के अनुसार इस दिन गंगा-स्नान एवं पूजन से दस प्रकार के दोषों से मुक्ति मिलती है । दस इंद्रियों वाले तन का पूर्णतः स्वस्थ रहने के भाव में ऐसा कहा गया है। क्योंकि तन स्वस्थ रहेगा तो मन भी उच्च भाव में होगा और हर कार्य में सफलता मिलेगी ।
1जून को गंगा-दशहरा- दिन छोड़कर अन्य सारी स्थितियां इस दिन बन रही हैं । गंगा की महत्ता की दृष्टि से धर्मग्रन्थों के अनुसार यदि पुरुषोत्तम मास (मलमास) में गंगा दशहरा हो तो यह पर्व उसी अवधि में मनाना चाहिए ।
गंगा का पूजन- वैसे तो गंगा-दशहरा पूजन में 10 की संख्या में दीपक, फल और ताम्बूल चढ़ाने का विधान है लेकिन ऐसी कोई बाध्यता भी नहीं है । संभव नहीं हो तो एक ही घी के दिए में 10 संख्या का मॉनसिक स्मरण कर गंगा-तट पर जलाना चाहिए । इस दिन सत्तू और गुड़ के दस पिंड बनाकर गंगा में प्रवाहित करने का विधान है। किसी धातु, मिट्टी और कुछ न हो तो आटे से मां गंगा लिखकर पूजन करने से सारे फल प्राप्त हो जाते हैं । इन दिनों गंगा में मछलियों की तादाद अधिक होती है । अतः प्रकृति संरक्षण के उद्देश्य से विधि-विधान से पूजन करना चाहिए । जहां गंगा उपलब्ध नहीं हो, वहां किसी भी बहते हुए जल में गंगा का स्मरण कर पूजन करना चाहिए ।
मंत्र-जाप :-  ऊँ शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमो नमः इस मंत्र का अधिक से अधिक जप करना चाहिए । इसके अलावा गंगास्तोत्र का पाठ 10 बार करने का विधान है ।
सेतुबंध रामेश्वरं की स्थापना श्रीराम ने इसी दिन की थी।
साहित्य पक्ष
    मातृ-शक्तियों की आराधना में "जले थले निवासिनीं और वने-रणे निवासिनीं'' का जब प्रसंग आता है तो अभिधा अर्थों के अलावा लक्षणा अर्थों पर चिंतन-मनन किया जाए तो मानव शरीर जल-थल से निर्मित है और मन भी किसी जंगल से कम नहीं जिसमें निरन्तर युद्ध होता रहता है । शरीर में मांस-अस्थि थल ही है और इसमें 81% जल तत्व है जिससे थल हिस्सा सिंचित होता रहता है । ऋषियों ने इसी जल-थल की शुद्धता के लिए जप-तप, योग-अनुष्ठान, समुचित आहार-विहार, व्रत-उपवास का सन्देश दिया ।
भगीरथ की तपस्या
     गंगा दशहरा की आध्यात्मिक कथा सगर के श्रापित वंशजों की मुक्ति के लिए उसी कुल के राजा भगीरथ कठोर तपस्या करते हैं । उनकी तपस्या पर ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, दिन मंगलवार को हस्त नक्षत्र में ब्रह्मा के कमण्डल से माँ गंगा प्रकट होती हैं और पृथ्वी पर चलने की उनकी प्रार्थना स्वीकार करती हैं । लेकिन इसके पीछे ऋषियों के स्वास्थ्य-विज्ञान पर नजर डालें तो 10 इन्द्रियों वाले इस शरीर में जल-तत्व के सन्तुलित प्रवाह का भी उद्देश्य प्रकट होता है । सामान्यतया शरीर में जल-तत्व की कमी से डिहाइड्रेशन हो जाता है जिससे मृत्यु भी हो जाती है । ज्येष्ठ माह की भीषण गर्मी में जलीय सन्तुलन भी आवश्यक है । भावनात्मक दृष्टि से भी देखा जाए व्यक्ति स्वार्थ-लोभ, क्रोध की ऊष्मा से जब कठोर प्रवृत्ति का हो जाता है तो उसके शरीर पर बुरा असर पड़ता है । शरीर के आंतरिक तंत्र कठोर होते हैं । ऐसी स्थिति में सर्वाधिक असर रक्त-प्रवाह में बाधा के रूप में पड़ता है और हाई एवं लो ब्लडप्रेशर, ब्लड शुगर आदि बीमारियां जन्म लेती हैं । जबकि मन-मस्तिष्क में कोमलता- तरलता का भाव शरीर-गंगा को सुचारू करता है ।
देवलोक में शिव का नृत्य और गायन
    देवी-पुराण की कथा के अनुसार भगवान शंकर के विवाह में अनेक विसंगतियां आयीं । विवाह की जानकारी देने शंकर जी  विष्णुजी के पास गए  तो भगवान विष्णु ने वातावरण को सरस बनाने के लिए कुछ गीत-संगीत सुनाने के लिए कहा । इस पर शंकरजी ने गीत गाना शुरू किया तब विष्णुजी आनन्द में इतने द्रवीभूत हुए कि वैकुण्ठ में जलप्लावन होने लगा । जिसे ब्रह्मा ने अपने कमण्डल में एकत्र कर लिया । कथा से स्पष्ट है कि तनाव के दौर में संगीत से मन प्रसन्न होता है । शरीर के रसायन (केमिकल) एवं हार्मोन्स अनुकूल होते हैं । शरीर में तरलता आती है और यह शरीर सगर-पुत्रों की तरह अभिशप्त होने से मुक्त होता है । इसीलिए लोकमान्यता है कि गंगा-तट पर गीत-संगीत, मन्त्र-भजन करना चाहिए जिसकी ध्वनि से जल का प्रदूषण दूर होता है जबकि गंगा किनारे नकरात्मक आचरण से प्रदूषण बढ़ता है । इसी प्रदूषण को दूर करने के लिए भगवान कृष्ण यमुना में कूद कर कालिया-नाग जैसे प्रदूषण को समाप्त करते हैं ।
विष्णु के पग से निकली गंगा
     वामन-पुराण की  कथा के अनुसार राजा बलि से 3 पग मांगने भिक्षुक बनकर विष्णुजी जाते हैं । एक पग से पृथ्वी नाप लिया, दूसरा आकाश की तरफ बढ़ते हुए ब्रह्मलोक गया । धूल-धूसरित हुए विष्णुजी के पग को जल से प्रक्षालित कर ब्रह्मा ने कमण्डल में रख लिया । वहीं गंगा हैं ।  इस दृष्टि से कृषि प्रधान देश में  भगवान विष्णु का धरती से अनाज के रूप में जीवन पैदा करने की व्यवस्था झलकती है । एक पग से किसान के रूप में लघु बनकर धरती को उपजाऊ बनाया और दूसरी ओर आकाश से जलवर्षा की व्यवस्था की । इस गर्मी के बाद खरीफ की फसल की तैयारी का भी भाव है । तीसरा पग बलि के सिर पर रखने का आशय ही है कि मस्तिष्क दयार्द्र रहे न कि अहंकारग्रस्त । स्पष्ट है कि गंगा-दशहरा शरीर में प्रवाहित गंगा के प्रति सजगता पैदा करना है । क्योंकि जब किसी के मन से संवेदना का पानी सूख जाता है वह परिवार और समाज के लिए कठोर हो जाता है । कठोरता से तरलता की यात्रा का पर्व है गंगा-दशहरा ।
                  सलिल पाण्डेय, मिर्जापुर ।
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