शाश्वत जगत शाश्वत क्रम
शाश्वत है प्रकृति का नियम,
गिर उठ चल फिर बढ़
चलते रहना ही है जीवन का उद्गम।।
निर्बाध गति से चलती रहती
नदियाँ भी कल-कल करती
गुंजायमान है चिड़ियों की चहचहाहट
मिश्री कानों में घोलती रहती
चलते रहना ही जीवन का उद्गम
यह संदेश सुनाती रहती।।
शाश्वत है कष्टों का आना
मानव का घबराना फिर आगे बढ़ना,
काले मेघों को चीरकर
सूरज सा ज्योतिर्मान होना
ठोकरें खाकर भी आगे बढ़ना
चलते रहना ही जीवन का उद्गम
संकल्प यही मानते रहना।।
जो रुक कहीं गए एक जगह,
जीवन प्रारब्ध न होगा वहाँ,
तो बस चलते रहना चलते रहना
चलते रहना ही है जीवन का उद्गम
प्रेरणा यही देते रहना।।
- वर्षा शर्मा-
लंभुआ, सुल्तानपुर
उत्तरप्रदेश
शाश्वत है प्रकृति का नियम,
गिर उठ चल फिर बढ़
चलते रहना ही है जीवन का उद्गम।।
निर्बाध गति से चलती रहती
नदियाँ भी कल-कल करती
गुंजायमान है चिड़ियों की चहचहाहट
मिश्री कानों में घोलती रहती
चलते रहना ही जीवन का उद्गम
यह संदेश सुनाती रहती।।
शाश्वत है कष्टों का आना
मानव का घबराना फिर आगे बढ़ना,
काले मेघों को चीरकर
सूरज सा ज्योतिर्मान होना
ठोकरें खाकर भी आगे बढ़ना
चलते रहना ही जीवन का उद्गम
संकल्प यही मानते रहना।।
जो रुक कहीं गए एक जगह,
जीवन प्रारब्ध न होगा वहाँ,
तो बस चलते रहना चलते रहना
चलते रहना ही है जीवन का उद्गम
प्रेरणा यही देते रहना।।
- वर्षा शर्मा-
लंभुआ, सुल्तानपुर
उत्तरप्रदेश
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