कृष्ण भागे आवें जब कोई बोले राधे
कैसे गोपकन्या प्रेयसी राधा बनी
नहीं कृष्ण, ऐसे तो काम नहीं चलेगा !
फिर कैसे चलेगा प्रेयसी !
देखो, तुम सुबह ब्रह्ममुहूर्त में जागोगे, फिर योग करोगे 4 से 6 बजे तक । इसके बाद 8 से 10 गांव के लोगों से मिलोगे, उनकी समस्याओं को सुनोगे और उसका समाधान करोगे । फिर शाम 5 बजे तक गो-चराने और खेती-किसानी करने के लिए जाओगे । वहां से जब लौटोगे तब यमुना तट पर मैं आऊंगी । वहीं तुम बांसुरी बजाओगे और मैं नृत्य करूंगी, रास-लीला वहीं होगी ।
कृष्ण छक्के-बक्के होकर प्रेयसी को देखने लगे
क्या देख रहे हो, कृष्ण !-प्रेयसी ने पूछा ।
कृष्ण बोले-तुमने मेरे जीवन की और मेरी सोच की धारा ही बदल दी । अब तो धारा बदलने के कारण मैं भी धारा शब्द को उल्टा कर तुम्हें राधा कहूंगा ।
....और फिर एक प्रेयसी कृष्ण की मार्गदर्शिका बन गई
कृष्ण ने कहा तुम अब मेरी आराध्या भी हो गई ।
प्रसंग यह है कि जब कृष्ण ने इस गोप-कन्या को देखा तो मोहित हुए । रातभर नींद नहीं आई । उसी में डूबे रहे। सुबह होते ही भोर में कृष्ण पहुंच गए राधा के द्वार और बजाने लगे मुरली ।
राधा बाहर निकल कट आईं और फिर ऊपर वर्णित संवाद हुआ ।
आशय- किसी के जीवन में नेतृत्व करने की क्षमता जो भर दे और कर्मयोगी बना दे, वही वन्दनीया नारी वरना नारी तो शूर्पणखा भी थी । सिर्फ वासना प्रज्वलित कर स्वार्थ सिद्ध करने वाली कैकेई भी थी। नारी शब्द भी नृ धातु से बना है। लोकोपयोगी नेतृत्व नारायण बना देता है।
द्रष्टव्य- कृष्ण मुरली और वंशी दोनों बजाते हैं । स्वर्ण (सोने) धातु की मुरली* होती है और बांस की बंशी।
©सलिल पांडेय, मिर्जापुर
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