राधाष्टमी (26 अगस्त) पर योगमाया के धाम से मंगलकामनाएँ

 


कृष्ण भागे आवें जब कोई बोले राधे

कैसे गोपकन्या प्रेयसी राधा बनी

      नहीं कृष्ण, ऐसे तो काम नहीं चलेगा !

      फिर कैसे चलेगा प्रेयसी !

देखो, तुम सुबह ब्रह्ममुहूर्त में जागोगे, फिर योग करोगे 4 से 6 बजे तक । इसके बाद 8 से 10 गांव के लोगों से मिलोगे, उनकी समस्याओं को सुनोगे और उसका समाधान करोगे । फिर शाम 5 बजे तक गो-चराने और खेती-किसानी करने के लिए जाओगे । वहां से जब लौटोगे तब यमुना तट पर मैं आऊंगी । वहीं तुम बांसुरी बजाओगे और मैं नृत्य करूंगी,  रास-लीला वहीं होगी ।

    कृष्ण छक्के-बक्के होकर प्रेयसी को देखने लगे

                क्या देख रहे हो, कृष्ण !-प्रेयसी ने पूछा ।

     कृष्ण बोले-तुमने मेरे जीवन की और मेरी सोच की धारा ही बदल दी । अब तो धारा बदलने के कारण मैं भी धारा शब्द को उल्टा कर तुम्हें राधा कहूंगा ।

....और फिर एक प्रेयसी कृष्ण की मार्गदर्शिका बन गई

 कृष्ण ने कहा तुम अब मेरी आराध्या भी हो गई ।

प्रसंग यह है कि जब कृष्ण ने इस गोप-कन्या को देखा तो मोहित हुए । रातभर नींद नहीं आई । उसी में डूबे रहे। सुबह होते ही भोर में कृष्ण पहुंच गए राधा के द्वार और बजाने लगे मुरली ।

    राधा बाहर निकल कट आईं और फिर ऊपर वर्णित संवाद हुआ ।

आशय- किसी के जीवन में  नेतृत्व करने की क्षमता जो भर दे और कर्मयोगी बना दे, वही वन्दनीया नारी वरना नारी तो शूर्पणखा भी थी । सिर्फ वासना प्रज्वलित कर स्वार्थ सिद्ध करने वाली कैकेई भी थी। नारी शब्द भी नृ धातु से बना है। लोकोपयोगी नेतृत्व नारायण बना देता है।

द्रष्टव्य- कृष्ण मुरली और वंशी दोनों बजाते हैं । स्वर्ण (सोने) धातु की मुरली* होती है और बांस की बंशी।

                         ©सलिल पांडेय, मिर्जापुर

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