पितृ-देवताओं की तिथि है अमावस्या


◆अमावस्या-तिथि पितृ-देवताओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने तिथि है। ◆देवता संभव है आजीवन प्रार्थना, पूजा-पाठ, व्रत-उपवास, यज्ञ-अनुष्ठान से न रीझे लेकिन पितृदेवता जरा-सी श्रद्धा से रीझ जाते हैं। ◆हर इंसान के माता-पिता होते हैं। वंश-वृक्ष में वे उपर और व्यक्ति नीचे होता है। श्रद्धा ही डाल की मजबूती होती है। श्रद्धा सूखी तो डाल से टूट कर धरती पर धड़ाम से गिरना ही पड़ता है।


   ◆माता-पिता या उनसे ऊपर की पीढ़ी जीवित हो तो अमावस्या को उनका विशेष आदर करते हुए अगली अमावस्या-तिथि तक सेवा का संकल्प लेना चाहिए। ◆पितरों के सम्मान न करने पर कोई देवता प्रसन्न हो ही नहीं सकते । ◆पितरों की उपेक्षा से अगली पीढ़ी बर्बाद होती है। ◆माता-पिता या उनसे उपर की पीढ़ी की जीवित-अवस्था मे अवज्ञा, अपमान और सेवा में कमी रह गई हो तो अमावस्या तिथि को खुद अपने को दंड देना चाहिए।


◆दंड निर्धारण में पितरों के अपमान फलस्वरूप अमावस्या को व्रत अवश्य रहना चाहिए। अपनी तमाम सुख और आनन्द की इच्छाओं को नियंत्रित करना चाहिए। ◆खुद का मूल्यांकन अति असहाय न कर जितना संभव हो, उतनी मदद किसी सुपात्र असहाय व्यक्ति करनी चाहिए । ◆पितरों की दिशा दक्षिण और तर्पण दाहिने हाथ के अंगुष्ठ तथा तर्जनी के मध्य से करने का आशय ही उनके निमित्त जो भी करें मजबूती से है। बाएं हाथ से कोई कार्य नहीं करने का है । ◆धर्मशास्त्रों के अनुसार सुपात्र का चयन जरूर करना चाहिए। अपात्र को दी गई मदद का कोई लाभ नहीं है।


    ◆सुपात्र के चयन में समर्थ, सक्षम, नशा करने वालों, आलसी और भीख मांगकर जीवन चलाने वालों को त्याग देना चाहिए। ◆खोज कर किसी विद्यार्थी जो निर्धन हो, उसकी मदद करनी चाहिए। ◆10  साल तक के बच्चे देव-स्वरूप बताए गए हैं इसलिए सिर्फ एक दिन ही नहीं, हमेशा इनको स्नेह-प्रेम करना चाहिए। ◆अपने तथा अन्य किसी भी बच्चे के प्रति स्नेह-मदद करने वाले को देवालय-शिवालय जाने की जरूरत नहीं।

                        ©सलिल पांडेय, मिर्जापुर।

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