रजनीकांत अवस्थी
डलमऊ/रायबरेली: बंगाल के महिषादल जिला मेदिनीपुर में 11 फरवरी 1896 को जन्मे पं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हिन्दी छायावादी युग के कवियों में से एक हैं। निराला ने अन्य कवियों से हटकर कविता में कल्पना का सहारा न लेकर वास्तविक पात्रों का चित्रण अपनी रचनाओं में किया। रुढि़वादिता का मुखर विरोध करते हुए यथार्थ को अपने साहित्य से जन सामान्य के सामने रखा। धर्म नगरी डलमऊ में रहकर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने कई रचनाएं की। इसीलिए इसे निराला की कर्मस्थली के रुप में भी जाना जाता हैं।
आपको बता दें कि, डलमऊ में ही पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने तुलसी साहित्य का अध्ययन किया। उन्होंने डलमऊ में ही रहकर संस्कृत आचार्य पंडित गिरजादत्त से संस्कृत भाषा की शिक्षा प्राप्त की। डलमऊ के पंडित रामदयाल और माता पार्वती से जन्मी सरस्वती स्वरूपा मनोहरा देवी का विवाह पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से हुआ था। विवाह के आठ वर्ष बाद ही मनोहरा देवी सदैव के लिए यादों में समाहित हो गई। डलमऊ में ही पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने रचनाएं की। जिनके पात्र कुल्ली भांट, प्रभावती, विल्हेश्वर बकरिहा आदि पात्र डलमऊ के ही निवासी थे, अलका आदि उपन्यास व 'वह तोड़ती पत्थर' आदि अनेक रचनाओं को मूर्त रुप दिया। वरिष्ठ पत्रकार सुभाष पांडेय ने बताया कि, निराला जी ने अप्रतिम रचनाएं करके हिन्दी को सर्वोत्तम शिखर तक पहुंचाया है। डलमऊ गंगा तट पर स्थित संकट मोचन घाट व निराला पार्क में निराला जी व उनकी पत्नी मनोहरा देवी की प्रतिमाएं स्थापित हैं। प्रति वर्ष निराला जयंती के अवसर पर निराला स्मृति संस्थान डलमऊ की ओर से कई कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।
श्री पांडेय ने बताया कि, निराला जी की प्रमुख रचनाओं में अनामिका 1923, परिमल 1930, गीतिका 1936, द्वितीय अनामिका 1938, तुलसीदास 1938, कुकुरमुत्ता 1942, अणिमा 1943, बेला 1946, नये पत्ते 1946, अर्चना 1950, आराधना (1953), गीतकुंज 1954, सांध्यकाकली, अपरा और रागविराग में उनकी चुनिन्दा रचनाओं में हैं।

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