निराला के लिए डलमऊ और डलमऊ के लिए निराला वैसे ही है जैसे जिस्म और रूह।। Raebareli news ।।

रजनीकांत अवस्थी

महराजगंज/रायबरेली: डलमऊ का साहित्यिक इतिहास में भी एक अनूठा स्थान है, क्योंकि यह वही स्थान है, जहाँ किले पर बैठ कर प्रसिद्ध हिन्दी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला जी ने नीचे के दृश्यों को देखते हुये अपनी कवितायें लिखी। डलमऊ में नवाब शुजाउद्दौला का इब्राहिम शारिक महल भी है। भारतीय साहित्य के हज़ारों साल के इतिहास में बस कुछ ही लोग हैं, जो अपने विद्रोही स्वर, अनुभूतियों की अतल गहराईयों और सोच की असीम ऊंचाईयों के साथ भीड़ से अलग दिखते हैं। निर्विवाद रूप से सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का नाम उनमें एक हैं।

     आपको बता दें कि, बंगाल के महिषादल जनपद मेदिनीपुर में 21 फरवरी 1896 को बसंत पंचमी के दिन जन्मे पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपने जीवन के विषाद, विष, अंधेरे को जिस तरह से करुणा और प्रकाश में बदला, वह हिंदी साहित्य में अद्वितीय है। निराला के लिए डलमऊ और डलमऊ के लिए निराला वैसे ही है, जैसे जिस्म और रूह। निराला की ससुराल पर तमाम दुश्वारियों से टकराते हुए निराला ने अपनी ज़िन्दगी के बेशकीमती साल गुज़ारे। दशकों बीत गए पर आज भी निराला की लेखनी की सीली सीली खुशबू डलमऊ के कोने कोने में रची बसी हुई हैं। यहां के चप्पे-चप्पे पर उस बेचैनी और अधूरेपन का अहसास होता है, जिसने निराला को महाप्राण बनाया।

    अपने रंग-रूप और डील-डौल से वास्तव में किसी ग्रीक देवता की तरह नजर आने वाले निराला की लेखनी में डलमऊ के अनगिनत रंग दिखते हैं। वह चाहे डलमऊ का पक्का घाट हो या सड़क घाट हो और फिर चाहे किले की बारादरी हो या फिर टिकैतगंज हो चाहे बड़ा मठ हो या उनके जिगरी यार कुल्ली भाट का वह घर जहां से उन्होंने उस दौर में जातिवाद और रूढ़िवाद के फन पर, जो कुठाराघात किया था उसकी धमक आज भी सुनाई देती है।

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