"शहर ख़ुशनुमा"
ढूंढता हूँ जहाँ में शहर ख़ुशनुमा, लोग रहते हों जिसमें अमन की शरण,
दिल खुले हों मुहब्बत का माहौल हो, साफ चेहरे सभी के बिना आवरण ।
कोई भूखा न प्यासा वहाँ पर रहे, कोई शोषित वहाँ पर मिले ना कभी,
प्रेम की बारिशें हो रही हों वहाँ, भाव संतुष्टि धारण किए हों सभी ।
ना कोई जुल्म हो ना तमाशा वहाँ, अर्थ पीछे न भगती मनुजता दिखे,
धर्म धारण करे जो जिसे मानता, कर्म में ही सभी की निहित आस्था ।
हों सुगन्धित हवायें वहाँ डोलती, हर कली मुक्त हो आवरण से सदा,
प्रेम की रागिनी हो वहाँ गूँजती, दिल मिलाने की आती हो सबको अदा ।
Written by ~ कमल बाजपेई

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