"जीवन सफर के रंग"
मैं मुसाफिर खड़ा देखता रह गया, लोग आये और आकर चले भी गए,
कुछ मिटाने लगे रास्ते की थकन, कुछ नए अनुभवों को बताने लगे ।
रेल की पटरियाँ हैं समान्तर चलें, यदि मिलन हो गया त्रास ही त्रास है,
लोग कहते जुदाई को मुश्किल घड़ी, पर मिलन भी यहाँ एक संत्रास है ।
ज़िंदगी के सफर में कई रंग हैं, कुछ चटक हैं बहुत से धुँधलके लिए,
जो चटक पा गए तो सुहाना सफर, यदि धुँधलके मिले तो निभाना प्रिये ।
है सफ़र यदि कठिन तो गुजर जायेगा, हम सफ़र का सफ़र में सहारा मिले,
घाव कैसा भी हो वक्त ही पाट दे, गर हमें आपके संग गुजारा मिले ।
छंट गई बदलियाँ हट गई सब घटा, इंद्रधनुषी छटा सामने आ गई,
रश्मियों की छुवन गुदगुदाने लगी, नृत्य मन के मयूरों का छाने लगा ।
मैं मुसाफिर खड़ा देखता रह गया ..........!!!
Written by ~ कमल बाजपेई

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