"लौटा दो बचपन"
दे सको तो बताओ प्रिये मैं कहूँ, मुझको बचपन मेरा वापसी चाहिए ।।
वह हँसी चाहिए, रूठना चाहिए, मुझको आँचल में माँ की छुपन चाहिए,
मैं छिपूँ द्वार की ओट में जब प्रिये, जानकर भी मुझे ढूँढना चाहिए,
वो घरौंदा बनाकर उन्हें फिर मिटा, सबसे खुट्टी मेरी फिर मिलन चाहिए ।
दे सको तो बताओ प्रिये मैं कहूँ, मुझको बचपन मेरा वापसी चाहिए ।।
अपनी गुड़िया की शादी करूँ धूम से, बैंड बाजे बजें खूब आये मज़ा,जब बिदाई का क्षण पास आता दिखे, मैं सुबक कर संभल जाऊँ फिर ब्यस्तता,
झूठ का ही सही खूब खाना बने, मैं परोसू उन्हें साथ माँ अरु पिता ।
दे सको तो बताओ प्रिये मैं कहूँ, मुझको बचपन मेरा वापसी चाहिए ।।
वारिसों में घटायें घिरें झूमकर, भीगकर नाच लूँ साथ तेरे सदा,कागजी नाव छोड़ा नदी मानकर, नाव बढ़ती रही मैं उछलता रहा,
कल्पना ही सही सभी सच्चा लगा, नाव डूबे न मेरी मनाता रहा ।
दे सको तो बताओ प्रिये मैं कहूँ, मुझको बचपन मेरा वापसी चाहिए ।।
माँ सुनाती कहानी मुझे रोज़ थी, हाँथ तकिया बना ताकता - ताकता,हो द्रवित आँख से आँसुओं की झड़ी, मैं कहानी में खुद को समाता रहा,
नींद लेती मुझे अपने आगोश में, माँ की थपकी का छाने लगा था नशा ।
दे सको तो बताओ प्रिये मैं कहूँ, मुझको बचपन मेरा वापसी चाहिए ।।
रचयिता ~ कमल बाजपेई

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