सार........
कायदे से अगर निर्माण समय बाद के चुने हुए जनप्रतिनिधियों द्वारा इस भवन को कायाकल्प योजना में ले लिया गया होता, तो शायद इन इमारतों की जिंदगी बढ़ जाती। परंतु ठेकेदारों की कौन कहे। मजे की बात यह है कि, अपने लोगों ने भी गांव का विकास सोचने के बजाय इस भवन के ठीक सामने सामुदायिक शौचालय बनवा कर बारात घर का दरवाजा भी अवरोधित कर दिया, जनप्रतिनिधियों द्वारा इस भवन को संरक्षित करने का प्रयास नहीं किया गया। जबकि कुछ ग्रामीणों ने इसके कई कमरों में भूसा इत्यादि भरकर जानवर बांधने तक का कार्य करना प्रारंभ कर दिया है।
विस्तार.........
शिवाकांत अवस्थी
महराजगंज/रायबरेली: सरकार द्वारा पिछले 5 वर्षों के दौरान कायाकल्प योजना के अंतर्गत विद्यालय, पंचायत घर व बारात घरों को सहेज कर रखने के लिए अभियान चलाया गया, किंतु कुछ संपत्तियां ऐसी थी, जो उपयोग से पहले ही तत्कालीन शासन सत्ता में बैठे ठेकेदारों के द्वारा बनवाई गई थी, इतनी जर्जर थी कि, उनका एक दिन भी उपयोग नहीं हुआ। जो जर्जर भवन शेष बचे भी थे, तो मौजूदा जनप्रतिनिधियों द्वारा उनकी मरम्मत ना करा कर उन्हें और अनुपयोगी बनाने का प्रयास किया गया।
आपको बता दें कि, रायबरेली जिले की महराजगंज तहसील क्षेत्र के बछरावां विकासखंड के गांव शेखपुर समोधा में मायावती शासन काल में कई सचिवालय बनाए गए थे, जिनमें तिलेंडा, समोधा सहित बहुत से गांव में निर्माण के समय इतनी घटिया सामग्री का प्रयोग किया गया था कि, गांव के लोग इन भवनों में आने से डरने लगे। ग्रामीणों द्वारा उस समय शिकायतें भी की गई, परंतु कोई सुनवाई नहीं हुई। यह भवन दिन प्रतिदिन बद से बदतर होते गए, इसी कड़ी में शेखपुर समोधा का बना सचिवालय भी गिना जा सकता है। जिसकी दीवारें निर्माण के चंद दिनों बाद ही प्लास्टर छोड़ने लगी, देखते ही देखते बिल्डिंग बद सूरत नजर आने लगी।
बाद के चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने इस ओर देखना भी गवारा नहीं समझा। यही दशा इस ग्राम सभा के अंदर बारात घर की हुई, वह भी निर्माण के चंद दिनों बाद ही जर्जर होने लगा। बारात घर के निर्माण के समय ही बारातियों के उपयोग के लिए बाहर 3 शौचालय बनवाए गए थे, जनरेटर आदि की भी व्यवस्था थी। लेकिन भवन इतना जर्जर था कि, लोगों ने उसमें बारात रुकवाना उचित नहीं समझा। ग्रामीणों के अनुसार आश्चर्य की बात यह है कि, इस बारात घर में आज तक एक भी बारात नहीं रुकी। इसका निर्माण वर्ष 2008/2009 में कराया गया था।
कायदे से अगर निर्माण समय बाद के चुने हुए जनप्रतिनिधियों द्वारा इस भवन को कायाकल्प योजना में ले लिया गया होता, तो शायद इन इमारतों की जिंदगी बढ़ जाती। परंतु ठेकेदारों की कौन कहे। मजे की बात यह है कि, अपने लोगों ने भी गांव का विकास सोचने के बजाय इस भवन के ठीक सामने सामुदायिक शौचालय बनवा कर बारात घर का दरवाजा भी अवरोधित कर दिया, जनप्रतिनिधियों द्वारा इस भवन को संरक्षित करने का प्रयास नहीं किया गया। जबकि कुछ ग्रामीणों ने इसके कई कमरों में भूसा इत्यादि भरकर जानवर बांधने तक का कार्य करना प्रारंभ कर दिया है, जब से सामुदायिक शौचालय का निर्माण हुआ है तब से आज तक कोई भी गांव का व्यक्ति इस में शौच क्रिया के लिए नहीं गया, और जब से यह निर्मित हुआ है तब से इसका ताला बंद भी है। यह भी ज्ञात हुआ है कि, एक अपुष्ट (इस जानकारी की पुष्टि नहीं हुई) सूचना के मुताबिक इस शौचालय में ₹9000 मासिक का सफाई कर्मी भी तैनात है। इसकी तैनाती की सत्यता क्या है यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, फिलहाल कर्मचारी तैनात होने की चर्चा गांव में जोरों पर है।
ग्रामीणों द्वारा जिलाधिकारी को एक लिखित पत्र भेजकर इन भवनों का भौतिक सत्यापन कराकर निर्माण एजेंसी के विरुद्ध कार्यवाही करने के साथ-साथ ग्राम सभा को आदेशित किया जाए कि, वह कायाकल्प योजना के अंतर्गत इनका पुनरुद्धार कराएं।





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