महामना को घेर लिया जातीय दायरे में और अटल जी सिर्फ दलीय दायरे में।। Mirzapur news ।।

राष्ट्रीय एकीकरण में क्रिसमस का जिक्र नहीं तो हिदुस्तानी अकादमी भी हुआ विवादों में---
Salil Pandey 
मिर्जापुर: BHU के संस्थापक महामना मदनमोहन मालवीय की जयंती जिले में सीमित दायरे में मनाई गई । एक तो मिर्जापर के बरकछा स्थित साउथ कैम्पस में व्यापक रूप से मालवीय जी के  चिंतन पर चर्चा, सेमिनार, साहित्य का प्रकाशन होना चाहिए था लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। जिले के स्वयंभू ब्राह्मण संगठनों में कुछेक ने दो दिन से मालवीय जयंती के नाम पर उन्हें जातीय 'लक्ष्मण-रेखा' के भीतर ही रख दिया । ब्राह्मण से ही सनातन संस्कृति के अस्तित्व को लेकर बहस हो गई । जबकि मालवीय जी इन सीमित दायरों से ऊपर थे ।
सच कहें तो शिव के अवतार थे---
काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है । आध्यात्मिक दृष्टि से मिर्जापुर काशी प्रान्त के अंतर्गत माना जाता है । बाबा विश्वनाथ की पगड़ी यानि जटा से गंगा निकलती हैं तो मालवीय जी की पगड़ी से ज्ञानगंगा बही हैं । ज्ञान का मतलब मानव जाति । अतः लोगों को मालवीय जी पर ब्राह्मण संगठनों का कॉपीराइट उचित तो नहीं लगता ।
अटलजी सिर्फ एक दल के हुए!---
पूर्व प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी बाजपेयी की जयंती भी एक ही दल ने मनाई । जबकि वे सर्वप्रिय नेता थे । उनके निधन पर जगह जगह सहित्यसमाज को जुटा कर उनके व्यक्तित्व को ऊंचा किया गया था । यहां तक कि उम्मीद थी कि विंध्याचल में अमरावती चौराहे पर लगी प्रतिमा का लोकार्पण उनके जन्मदिवस पर होगा लेकिन किसी बड़े नेता के पास सम्भवतः समयाभाव था, लिहाजा उनकी प्रतिमा जन्मदिन पर भी रस्सियों से जकड़ी ही रही । यही स्थिति भरूहना चौराहे पर सरदार पटेल की प्रतिमा की भी है ।
राष्ट्रीय एकीकरण की मंशा पर पानी--
गत महीने जिला पंचायत में राष्ट्रीय एकीकरण की बैठक में तय हुआ था कि क्रिसमस, मदनमोहन मालवीय और अटल जी की जयंती पर शहीद उद्यान में कार्यक्रम किया जाएगा । कुछेक कवियों ने इस कार्यक्रम को एकीकरण की जगह खण्ड खण्ड गुटों का कार्यक्रम बना दिया । राष्ट्रीय एकीकरण के सदस्यों को भी कार्यक्रम और समय की सूचना नहीं दी । एक गुट दूसरे गुट को शिकस्त देने में सफल दिखा । क्रिसमस का जिक्र तक नहीं हुआ और न ही इस समुदाय का कोई उपस्थित हुआ । जबकि सामाजिक एकता के लिए कमिश्नर, DIG, DM, SP सहित पूरा प्रशासन इन दिनों कड़क ठंड के बावजूद सड़कों पर भ्रमण कर रहा है ।
माई धिया गवनहर बाप पूत बराती---
प्रथम कहानी लेखिका बंग महिला का कार्यक्षेत्र मिर्जापुर नगर रहा है । वे तिवराने टोला में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साथ प्रेमघन की कोठी में भी आती रहीं । घण्टाघर स्थित म्योर लाइब्रेरी में वे अध्ययन करती रहीं । सुन्दरघाट स्थित बंगाली परिवार के उनके रिश्तेदार भी रहते हैं लेकिन उनके कार्यक्रम की सूचना किसी साहित्यप्रेमी, शोधार्थी को न देकर कुछेक लोगों ने यह जताने का प्रयास किया कि मिर्जापुर में हिंदुस्तानी अकादमी में वे सर्वाधिक पावरफुल हैं । मुख्यालय से कुछ ऐसे भी लोग गए जो पहलीबार बंग महिला को जानते भी नहीं होंगे और जो जानते हैं वे आमंत्रण देने वाले के आंख की किरकिरी शायद हैं !
     बहराल संकीर्ण सोच वाला हमेशा संकीर्ण ही रहेगा । बड़प्पन तो यह है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में मन को दबा कर कार्य करना चाहिए।

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