रजनीकांत अवस्थी
रायबरेली: प्राचीन समय में गौड़ देश बहुत विख्यात और उन्नति पर था इसी देश से बहुत सी जातियां निकली है जिनके साथ अब भी इस उत्तम देश का नाम पीछे लगा हुआ है। ब्राह्मणों में जुगुन और पच्त्र गौड़ हैं इसी उपरोक्त देश से निकले हुए हैं। ब्राह्मणों को पच्ञ गौड़ की उपाधि राजा आदिसूर के यज्ञ कराने के हेतु प्राप्त हुई थी और क्षत्रियों में जो गौड़ हैं वह भी इसी देश में निवास करने के कारण गौड़ कहलाए। जैसे सूर्यवंशी राजा रामचंद्र जी के वंश में से इस समय महाराना उदयपुर का वंश है। परंतु सिसोदिया में बास करने के कारण सिसोदिया कहलाते हैं।
यह बात जैमिनि आचार्य ने मीमांसाशास्त्र में स्पष्ट कही है और पुराणों में भी यही देखी जाती है। इसी प्रकार सूर्यवंशी राजा श्री रामचंद्र जी के भ्राता राजा भरत जी का वंश तक्षशिला व थानेश्वर से आकर गण देश में राज्य करने के कारण गौड़ क्षत्रिय कहलाए। इसी प्रकार वैश्य व कायस्थ भी गौड़ वैश्य व गौड़ कायस्थ कहलाए और भी कितनी ही जातियां हैं जो गौड़ देश में रहने के कारण गौड़ोपाधि धारण किए हुए हैं।
समय बलवान है सदा एक सा नहीं रहता। किसी समय गौड़ देश भारत की सर्वोच्च श्रेणी पर था परंतु अब वही देश बंगाल के मालदा जिले में अतिहीन दशा में विद्यमान है। इस देश की राजधानी लक्ष्मणवती थी जिस देश को इस समय लखनौती कहते हैं। इसको राजा सिंहादित्य देव गौड़ के पुत्र राजा लक्ष्मणादित्य देव ने अपने नाम से बसाया था। यहां पर अब भी प्राचीन राजप्रासाद वा तालाब आदि के चिन्ह साक्ष दे रहे हैं कि, वास्तविक में यह किसी समय गौड़ क्षत्रिय राजाओं की बहुत बड़ी राजधानी रही होगी। परंतु अब वर्तमान में तो अरण्य देव की राजधानी प्रतीत होती है। यहां के निवासी कर्षकगण अरण्य को साफ करके कृषी बढ़ाते जाते हैं (शहर) तलियों के साथ गौड़, अर्थात उपरोक्त राजधानी का क्षेत्रफल 20 से 30 वर्ग मील तक था। खास शहर उत्तर से दक्षिण तक साडे सात मील लंबा और एक से दो मील तक चौड़ा अर्थात 13 मील क्षेत्रफल को छिपाता था।
महानंदा और गंगा के मध्य गौड़ देश की तवाहियां फैली हुई है। गौड़ के पश्चिम भागीरथी के वर्तमान छोटे नाले में पहले गंगा की प्रधान धारा थी अब आठ-दस मील हट गई है। लगभग 6 मील लंबी किला बंदियों की एक पंक्ति भागीरथी के पुराने नाले से भोला हाट तक बक्रचेष्टा में फैली हुई है। किले की भीत ईटों से बनी हुई है। एक सौ फीट चौड़ी है घुमाव के पूर्वोत्तर भाग के समीप एक फाटक है उसके आसपास अनेक तालाब है गौड़ शहर के दक्षिण की दीवार में कोतवाली दरवाजा नामक सुंदर बनावट का फाटक खड़ा है। दुर्गप्रकार के मध्य उत्तर में आदिशूर आदि राजाओं के प्रासादों के चिंह है और पीछे गौड़ की उत्तरी शहर तली है। वही उत्तर के पश्चिम भाग में भागीरथी के निकट गौड़ राजाओं का बनाया हुआ उत्तर से दक्षिण प्राय: सोलहसौ गज लंबा और पूर्व से पश्चिम आठ सौ गज से अधिक चौड़ा सागरदीघी नामक मीठे जल का बड़ा तालाब है। प्यासबारी नामक खारे जल का ही तालाब फूलबाग के दक्षिण पूर्व में है। फूल बाग लगभग डेढ़ मील उत्तर खांई से घिरा हुआ है।
गौड़ में छोटे-छोटे तालाब प्रत्येक स्थानों में देखे जाते हैं। स्थान स्थान पर मकानों तथा छोटे-छोटे देव मंदिरों के चिन्ह दिखाई पड़ते हैं। गौड़ क्षत्रिय राजाओं का राज्य इस देश में लगभग विक्रम संवत 300 तक रहा। अनंतर इस देश का राज्य कितने ही राजाओं के आधीन में रहा, जिसका विवरण इतिहासों के अनुकूल नीचे लिखा जाता है।
गौड़ देश का इतिहास (बंग) में लिखा है कि, प्राग्योतिष्पुर के राजा भगदत्तवंश वाली हर्षदेव ने जब गौड़ देश में बहुत गड़बड़ देखा तो, गौड़ पर अपना अधिकार कर लिया। रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंदओझा ने सिरोही इतिहास के पृष्ठ 101 पर गुप्त वंश के राजाओं के वृत्तांत में लिखा है कि, चंद्रगुप्त दूसरे ने बंगाल से बिलोचिस्तान पर पर्यंत विजय किया जिसका समय लगभग विक्रम संवत 450 (ई0 सन 393) का लिखा है। श्री हर्षचरित्र बाणभट्ट चरित्र में लिखा है कि, गौड़ देश के राजा नरेंद्र गुप्त ने वैश्यवंशीय राजा राज्यवर्धन को विश्वासघात से मार डाला था। यह घटना विक्रम संवत ६६४ (ई0 सन्६०७) में हुई। राज्यवर्धन का उत्तराधिकारी उनका छोटा भाई हर्षवर्धन हुआ। जिसको श्रीहर्ष तथा शिलादित्य भी कहते हैं। उसने गौड़ (बंगाल) देश को जीता और अपने भाई का बदला लिया।
"पड़िहार" वंश प्रकाश में लिखा है कि, वत्सराज मारवाड़ के पड़िहारों में प्रथम प्रतापी राजा हुआ, इसने गौड़ (बंगाल) के राजा को विजय प्राप्त किया। इसका समय ७५० के लगभग था। (भोजप्रबंध में इसी राजा का वृतांत है) परंतु दक्षिण के राठौर राजा ध्रुवराज ने इसको परास्त कर मारवाड़ को भगाया। इसके पश्चात पाल वंशीय राजाओं का राज्य गौड़ देश पर हुआ। जैसा कि श्रीमान तारानाथ अब्दुल फजल व रमेशचंद्रदत्त ने लिखा है कि, इस वंश की शुद्ध वंशावली शिलालेख ताम्रपत्रों से रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने टाड़ राजस्थान के सातवें प्रकरण के टिप्पन में लिखा है, इससे विदित होता है कि, गोपाल ने लगभग ई0 सन् ८०० के करीब बंगाल में अपना राज्य स्थापित किया। अनंतर मगध को विजय किया इनका पुत्र धर्मपाल हुआ इसने इंद्रायुध (इंद्रराज) आदि को परास्त कर कन्नौज की गद्दी पर चक्रायुध को बिठाया।
चक्रायुध से कन्नौज का राज्य मारवाड़ के पड़िहार राजा नागभट्ट ने छीना। अंततः देव पाल पाल वंशी गौड़ देश का राजा हुआ। इसके पश्चात 14 पाल वंशी राजाओं ने गौड़ देश पर राज्य किया। बंगाल का बड़ा हिस्सा और मिथिला ई0 सन् की 12 वीं शताब्दी में पालबंशियों से सेनबंशियों ने छीन लिया। जिससे उनका राज्य दक्षिण बिहार में रह गया। सेनवंशी अपने को चंद्रवंशी मानते थे। ऐसा उनके शिलालेख दानपत्र और अद्भुत सागर नामक ग्रंथ से पाया जाता है परंतु एक लेख में इनको ब्रह्म क्षत्रिय (ब्राह्मण जो पीछे से क्षत्रियों में मिल गए वह ब्रह्मक्षत्रिय कहलाए) भी लिखा है। बंगाल में ऐसा भी प्रसिद्ध है कि, राजा बल्लवसेन जाति का वैध था और बंगाल में एक बल्लालसेन वैध भी हुआ है इसी आधार पर अब्दुलफजल ने भी सेनबंशियों को वैध लिख दिया है। सेनवंश के राजा पहले कर्नाटक की तरफ रहते थे (उधर के किसी राजा के सामंत हो) जहां से परास्त हो सामंतसेन बंगाल आकर भागीरथी गंगा के तट पर बसा सामंतसैन दक्षिण के राजा वीरसेन का वंशज था।
डॉ राजेन्द्र लाल मिश्र ने वीरसेन कों शूरसेन मानकर बंगाल में कुलीन ब्राह्मणों को लाने वाला आदिशूर वही है ऐसा अनुमान किया और सामंतसेन को वीरसेन (आदिशूर) का उत्तराधिकारी माना है परंतु रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा लिखते हैं कि, इन दोनों अनुमानों को स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि आदिशूर सामंतसेन से बहुत पूर्व बंगाल का एक प्रबल राजा था और वीरसेन दक्षिण से हार कर आया था इसका ई0सन् की ११ ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में होना अनुमान किया जा सकता है।
इसका प्रपौत्र विजयसेन हुआ, जो सेनवंश में प्रथम प्रतापी राजा यही हुआ। देवपाड़ा से मिले हुए शिलालेखों से पाया जाता है कि, स्नेह नाग्य और वीर नामक राजाओं को जीतकर कैद किया तथा गौड़ कामरूप और कलिंग के राजाओं पर विजय प्राप्त किया। इनका पुत्र बल्लालसेन हुआ स्नेह पालबंशी राजा महिपाल को कैद किया। इसका पुत्र लक्ष्मण सिंह हुआ। जिसके लिए कहा जाता है कि, स्नेह लक्ष्मणवती नगर बसाया जो लखनौती नाम से प्रसिद्ध हुआ, परंतु यह अनुमान ठीक नहीं है कारण कि, श्रीहरिश्चंद्र ने कालचक्र जो लिखा है उसमें कहा है कि, ७३१ ई0 पूर्व लखनौती नगर बसाया गया और यह भी है कि, लखनौती में मंदिर तालाब आदि जैसा ऊपर कहा गया है इतना शीघ्र तैयार नहीं हो सके थे। क्योंकि लक्ष्मणसेन हीं के समय मोहम्मद बख्तियारखिलजी ने विक्रम संवत १२५६ ई0 सन् ११९९ ) में इसकी राजधानी नदिया पर अचानक आक्रमण कर छीन लिया था। अंत में लखनौती छीनकर अपनी राजधानी बनाई। लक्ष्मणसेन नदिया से भागकर श्री जगन्नाथ जी की तरफ गया जहां से लौटकर विक्रमपुर में रहा। सन् १५३७ ईस्वी में शेरशाह अफगान ने गौड़ देश को लूटा। उसी समय से गौड़ की घटती आरंभ हुई। सन् १५७५ ई0 में दिल्ली के मुगल बादशाह अकबर ने गौड़ के सबसे पिछले अफगान बादशाह दाऊदखां को परास्त कर शहर को नष्ट किया।
रायबरेली: प्राचीन समय में गौड़ देश बहुत विख्यात और उन्नति पर था इसी देश से बहुत सी जातियां निकली है जिनके साथ अब भी इस उत्तम देश का नाम पीछे लगा हुआ है। ब्राह्मणों में जुगुन और पच्त्र गौड़ हैं इसी उपरोक्त देश से निकले हुए हैं। ब्राह्मणों को पच्ञ गौड़ की उपाधि राजा आदिसूर के यज्ञ कराने के हेतु प्राप्त हुई थी और क्षत्रियों में जो गौड़ हैं वह भी इसी देश में निवास करने के कारण गौड़ कहलाए। जैसे सूर्यवंशी राजा रामचंद्र जी के वंश में से इस समय महाराना उदयपुर का वंश है। परंतु सिसोदिया में बास करने के कारण सिसोदिया कहलाते हैं।
यह बात जैमिनि आचार्य ने मीमांसाशास्त्र में स्पष्ट कही है और पुराणों में भी यही देखी जाती है। इसी प्रकार सूर्यवंशी राजा श्री रामचंद्र जी के भ्राता राजा भरत जी का वंश तक्षशिला व थानेश्वर से आकर गण देश में राज्य करने के कारण गौड़ क्षत्रिय कहलाए। इसी प्रकार वैश्य व कायस्थ भी गौड़ वैश्य व गौड़ कायस्थ कहलाए और भी कितनी ही जातियां हैं जो गौड़ देश में रहने के कारण गौड़ोपाधि धारण किए हुए हैं।
समय बलवान है सदा एक सा नहीं रहता। किसी समय गौड़ देश भारत की सर्वोच्च श्रेणी पर था परंतु अब वही देश बंगाल के मालदा जिले में अतिहीन दशा में विद्यमान है। इस देश की राजधानी लक्ष्मणवती थी जिस देश को इस समय लखनौती कहते हैं। इसको राजा सिंहादित्य देव गौड़ के पुत्र राजा लक्ष्मणादित्य देव ने अपने नाम से बसाया था। यहां पर अब भी प्राचीन राजप्रासाद वा तालाब आदि के चिन्ह साक्ष दे रहे हैं कि, वास्तविक में यह किसी समय गौड़ क्षत्रिय राजाओं की बहुत बड़ी राजधानी रही होगी। परंतु अब वर्तमान में तो अरण्य देव की राजधानी प्रतीत होती है। यहां के निवासी कर्षकगण अरण्य को साफ करके कृषी बढ़ाते जाते हैं (शहर) तलियों के साथ गौड़, अर्थात उपरोक्त राजधानी का क्षेत्रफल 20 से 30 वर्ग मील तक था। खास शहर उत्तर से दक्षिण तक साडे सात मील लंबा और एक से दो मील तक चौड़ा अर्थात 13 मील क्षेत्रफल को छिपाता था।
महानंदा और गंगा के मध्य गौड़ देश की तवाहियां फैली हुई है। गौड़ के पश्चिम भागीरथी के वर्तमान छोटे नाले में पहले गंगा की प्रधान धारा थी अब आठ-दस मील हट गई है। लगभग 6 मील लंबी किला बंदियों की एक पंक्ति भागीरथी के पुराने नाले से भोला हाट तक बक्रचेष्टा में फैली हुई है। किले की भीत ईटों से बनी हुई है। एक सौ फीट चौड़ी है घुमाव के पूर्वोत्तर भाग के समीप एक फाटक है उसके आसपास अनेक तालाब है गौड़ शहर के दक्षिण की दीवार में कोतवाली दरवाजा नामक सुंदर बनावट का फाटक खड़ा है। दुर्गप्रकार के मध्य उत्तर में आदिशूर आदि राजाओं के प्रासादों के चिंह है और पीछे गौड़ की उत्तरी शहर तली है। वही उत्तर के पश्चिम भाग में भागीरथी के निकट गौड़ राजाओं का बनाया हुआ उत्तर से दक्षिण प्राय: सोलहसौ गज लंबा और पूर्व से पश्चिम आठ सौ गज से अधिक चौड़ा सागरदीघी नामक मीठे जल का बड़ा तालाब है। प्यासबारी नामक खारे जल का ही तालाब फूलबाग के दक्षिण पूर्व में है। फूल बाग लगभग डेढ़ मील उत्तर खांई से घिरा हुआ है।
गौड़ में छोटे-छोटे तालाब प्रत्येक स्थानों में देखे जाते हैं। स्थान स्थान पर मकानों तथा छोटे-छोटे देव मंदिरों के चिन्ह दिखाई पड़ते हैं। गौड़ क्षत्रिय राजाओं का राज्य इस देश में लगभग विक्रम संवत 300 तक रहा। अनंतर इस देश का राज्य कितने ही राजाओं के आधीन में रहा, जिसका विवरण इतिहासों के अनुकूल नीचे लिखा जाता है।
गौड़ देश का इतिहास (बंग) में लिखा है कि, प्राग्योतिष्पुर के राजा भगदत्तवंश वाली हर्षदेव ने जब गौड़ देश में बहुत गड़बड़ देखा तो, गौड़ पर अपना अधिकार कर लिया। रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंदओझा ने सिरोही इतिहास के पृष्ठ 101 पर गुप्त वंश के राजाओं के वृत्तांत में लिखा है कि, चंद्रगुप्त दूसरे ने बंगाल से बिलोचिस्तान पर पर्यंत विजय किया जिसका समय लगभग विक्रम संवत 450 (ई0 सन 393) का लिखा है। श्री हर्षचरित्र बाणभट्ट चरित्र में लिखा है कि, गौड़ देश के राजा नरेंद्र गुप्त ने वैश्यवंशीय राजा राज्यवर्धन को विश्वासघात से मार डाला था। यह घटना विक्रम संवत ६६४ (ई0 सन्६०७) में हुई। राज्यवर्धन का उत्तराधिकारी उनका छोटा भाई हर्षवर्धन हुआ। जिसको श्रीहर्ष तथा शिलादित्य भी कहते हैं। उसने गौड़ (बंगाल) देश को जीता और अपने भाई का बदला लिया।
"पड़िहार" वंश प्रकाश में लिखा है कि, वत्सराज मारवाड़ के पड़िहारों में प्रथम प्रतापी राजा हुआ, इसने गौड़ (बंगाल) के राजा को विजय प्राप्त किया। इसका समय ७५० के लगभग था। (भोजप्रबंध में इसी राजा का वृतांत है) परंतु दक्षिण के राठौर राजा ध्रुवराज ने इसको परास्त कर मारवाड़ को भगाया। इसके पश्चात पाल वंशीय राजाओं का राज्य गौड़ देश पर हुआ। जैसा कि श्रीमान तारानाथ अब्दुल फजल व रमेशचंद्रदत्त ने लिखा है कि, इस वंश की शुद्ध वंशावली शिलालेख ताम्रपत्रों से रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने टाड़ राजस्थान के सातवें प्रकरण के टिप्पन में लिखा है, इससे विदित होता है कि, गोपाल ने लगभग ई0 सन् ८०० के करीब बंगाल में अपना राज्य स्थापित किया। अनंतर मगध को विजय किया इनका पुत्र धर्मपाल हुआ इसने इंद्रायुध (इंद्रराज) आदि को परास्त कर कन्नौज की गद्दी पर चक्रायुध को बिठाया।
चक्रायुध से कन्नौज का राज्य मारवाड़ के पड़िहार राजा नागभट्ट ने छीना। अंततः देव पाल पाल वंशी गौड़ देश का राजा हुआ। इसके पश्चात 14 पाल वंशी राजाओं ने गौड़ देश पर राज्य किया। बंगाल का बड़ा हिस्सा और मिथिला ई0 सन् की 12 वीं शताब्दी में पालबंशियों से सेनबंशियों ने छीन लिया। जिससे उनका राज्य दक्षिण बिहार में रह गया। सेनवंशी अपने को चंद्रवंशी मानते थे। ऐसा उनके शिलालेख दानपत्र और अद्भुत सागर नामक ग्रंथ से पाया जाता है परंतु एक लेख में इनको ब्रह्म क्षत्रिय (ब्राह्मण जो पीछे से क्षत्रियों में मिल गए वह ब्रह्मक्षत्रिय कहलाए) भी लिखा है। बंगाल में ऐसा भी प्रसिद्ध है कि, राजा बल्लवसेन जाति का वैध था और बंगाल में एक बल्लालसेन वैध भी हुआ है इसी आधार पर अब्दुलफजल ने भी सेनबंशियों को वैध लिख दिया है। सेनवंश के राजा पहले कर्नाटक की तरफ रहते थे (उधर के किसी राजा के सामंत हो) जहां से परास्त हो सामंतसेन बंगाल आकर भागीरथी गंगा के तट पर बसा सामंतसैन दक्षिण के राजा वीरसेन का वंशज था।
डॉ राजेन्द्र लाल मिश्र ने वीरसेन कों शूरसेन मानकर बंगाल में कुलीन ब्राह्मणों को लाने वाला आदिशूर वही है ऐसा अनुमान किया और सामंतसेन को वीरसेन (आदिशूर) का उत्तराधिकारी माना है परंतु रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा लिखते हैं कि, इन दोनों अनुमानों को स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि आदिशूर सामंतसेन से बहुत पूर्व बंगाल का एक प्रबल राजा था और वीरसेन दक्षिण से हार कर आया था इसका ई0सन् की ११ ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में होना अनुमान किया जा सकता है।
इसका प्रपौत्र विजयसेन हुआ, जो सेनवंश में प्रथम प्रतापी राजा यही हुआ। देवपाड़ा से मिले हुए शिलालेखों से पाया जाता है कि, स्नेह नाग्य और वीर नामक राजाओं को जीतकर कैद किया तथा गौड़ कामरूप और कलिंग के राजाओं पर विजय प्राप्त किया। इनका पुत्र बल्लालसेन हुआ स्नेह पालबंशी राजा महिपाल को कैद किया। इसका पुत्र लक्ष्मण सिंह हुआ। जिसके लिए कहा जाता है कि, स्नेह लक्ष्मणवती नगर बसाया जो लखनौती नाम से प्रसिद्ध हुआ, परंतु यह अनुमान ठीक नहीं है कारण कि, श्रीहरिश्चंद्र ने कालचक्र जो लिखा है उसमें कहा है कि, ७३१ ई0 पूर्व लखनौती नगर बसाया गया और यह भी है कि, लखनौती में मंदिर तालाब आदि जैसा ऊपर कहा गया है इतना शीघ्र तैयार नहीं हो सके थे। क्योंकि लक्ष्मणसेन हीं के समय मोहम्मद बख्तियारखिलजी ने विक्रम संवत १२५६ ई0 सन् ११९९ ) में इसकी राजधानी नदिया पर अचानक आक्रमण कर छीन लिया था। अंत में लखनौती छीनकर अपनी राजधानी बनाई। लक्ष्मणसेन नदिया से भागकर श्री जगन्नाथ जी की तरफ गया जहां से लौटकर विक्रमपुर में रहा। सन् १५३७ ईस्वी में शेरशाह अफगान ने गौड़ देश को लूटा। उसी समय से गौड़ की घटती आरंभ हुई। सन् १५७५ ई0 में दिल्ली के मुगल बादशाह अकबर ने गौड़ के सबसे पिछले अफगान बादशाह दाऊदखां को परास्त कर शहर को नष्ट किया।










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