गुप्त नवरात्र की नवमी तिथि और मंत्रों की शक्ति

मां के गर्भ में सबसे पहले रीढ़ की हड्डी, फिर मस्तिष्क बनता है, यही है कमल का फूल जिस पर मां लक्ष्मी और विष्णु जी बैठते हैं- ---
तुलसीदास सर्प के सहारे रत्नावली से नहीं बल्कि कुंडलिनी जागरण में सफल हुए थे ।---
   विंध्यधाम, मीर (समुद्र)-जा-(पुत्री यानि लक्ष्मी)पुर-नगर से----
   जब मेडिलक साइंसकी मशीनें नहीं थीं तब ऋषियों की आंखें मशीन जैसी थी, जिन्होंने देखा कि माँ के गर्भ में सबसे पहले बच्चे की रीढ़ की हड्डी बनती है, उसके बाद सिर ।
     यहींहै कमल जिस पर विवेक रूपी देवी-देवताओं का वास होता है । रीढ़ की हड्डी कलमनाल जैसी और मस्तिष्क कमल के फूल जैसा । इसे सुमेरु पर्वत भी कह सकते हैं । जहां से रक्त-रसायनों की पवित्र नदियां पूरे शरीर में प्रवाहित होती हैं ।
मंत्रशक्ति क्या है ?---
आध्यात्मिक चिंतक हैं पूर्व IAS श्री सुरेश कुमार सिंह । मिर्जापुर में SDM और ADM के पद पर रहे । उन पर सिद्धपीठाधीश्वरी मां विन्ध्यवासिनी की निश्चित रूप से कृपा हुई कि वे मातृशक्ति के साधक बन गए । फिर मां सरस्वती के मंदिर के रूप में आद्याशक्ति पर कई पुस्तकें लिखीं । भदोही में DM और उसके बाद उ0प्र0 चीनी निगम के GM पद से सेवानिवृत्त हुए । विंध्य धाम की शक्तियों का संयोग ही रहा कि इनकी सेवानिवृत्ति के बाद इनका पदभार मां विन्ध्यवासिनी के ही साधक के रूप में स्थान बनाने वाले जिले के DM श्री विमल कुमार दुबे ने इनसे चार्ज लिया । यहां कमिश्नर पद से सेवा निवृत्त हुए श्री मुरलीमनोहर लाल ने इनके ट्रांसफर पर कहा कि एक साल और श्री दुबे यहां रह जाते तो विंध्य क्षेत्र को विश्व-पटल पर खड़ा करते और विदेशी पर्यटकों तक का वाराणसी आगमन होने लगता । इस बात का उल्लेख इसलिए करना पड़ा कि श्री एस के सिंह ने प्रश्न किया है कि मंत्र शक्ति क्या है ?
मंत्र का अर्थ---
हिंदी साहित्य के आदिगुरु शंकराचार्य माने गए आचार्य रामचंद्र शुक्ल, जिन्हें BHU के संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय ने एकेडमिक योग्यता वाले हिंदी के विद्वानों के बजाय बीएचयू में हिंदी विभागाध्यक्ष नियुक्त किया, ने मंत्र को गोप्य और रहस्यपूर्ण बात के रूप में परिभाषित किया है । उन्होंने वैदिक मंत्रों को परोक्षकृत, प्रत्यक्षकृत और आध्यात्मिक कहा । जिन मंत्रों द्वारा देवता को परोक्ष मानकर एवं प्रथम पुरुष की क्रिया का प्रयोग करके स्तुति की जाती है, वह परोक्षकृत मंत्र, जिन मंत्रों को देवता को प्रत्यक्ष मानकर मध्यम पुरुष के सर्वनाम तथा क्रिया का प्रयोग करके स्तुति की जाती है, उसे प्रत्यक्षकृत और जिन मंत्रों में देवता को खुद में मानकर सर्वनाम, क्रियाओं की स्तुति की जाती है, वह उत्तम पुरुष ।
यज्ञ विधान--
जिन वाक्यों द्वारा यज्ञ विधान भी किए जाते हैं, वह मंत्र कहलाता है । श्रीमद्भगवतगीता में भी श्रीकृष्ण ने यज्ञ-विधान का उपदेश क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीर की पवित्रता और शुद्धता की दृष्टि से दिया है । यानि मंत्रों से पर्यावरण को अनुकूल बनाने का उपक्रम भी । स्वस्तिवाचन मंत्रों में भी प्राकृतिक तत्वों की शांति की प्रार्थना की गई है । इसके अलावा मंत्र सलाह को भी कहते हैं ।
वैज्ञानिक युग और मंत्र शक्ति---
आध्यात्मिक ऋषियों ने संसार को भवसागर माना है । निश्चित रूप से सागर में रहने वाले जीवों, आकाश में टिमतिमाते ताराओं, धरती की मिट्टी में रहने वाले जीवाणुओं की तरह शून्य में तरंगों के बीच संसार है । इन तरंगों की शक्ति और क्षमता को यांत्रिक उपकरणों से विज्ञान जगत पकड़कर  हर रोज कुछ नए ईजाद कर रहा है । जिसे विज्ञान यंत्र के बल पर प्राप्त कर रहा है, उसे ऋषियों ने मंत्र के बल पर देखा, परखा और प्राप्त किया । यह सब कुछ साधना, खासकर मनुष्य कुंडलिनी शक्ति जागृत कर प्राप्त कर सकता है । निराला की कविता रत्नावली में भी उल्लेख मिलता है कि गोस्वामी तुलसीदास की कुंडलिनी शक्ति जब जागृत हुई तब उन्होंने रामचरित मानस की रचना की । सर्प की रस्सी के सहारे ऊपर चढ़कर रत्नावली से मिलने के प्रतीकों को देखा जाए तो उन्होंने सर्प जैसी रीढ़ की हड्डी के सहारे मस्तिष्क को ज्ञान का समुद्र बना दिया जिसके तट पर श्रीराम ने 3 दिन बैठकर प्राप्त किया यानि सत-रज-तम के तट को पार करना हीस्थितिप्रज्ञ बनने की क्रिया है ।
                       सलिल पांडेय, मिर्जापुर 
                           ©लेखकाधीन ।
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