चलो, चांद के पार चलो...' गीत पंक्तियां अध्यात्म में भी वर्णित कथाओं से मेल खाती हैं जिस पर विज्ञान जगत तेजी से काम कर रहा है । चांद सहित मंगल, वृहस्पति और अन्य ग्रहों पर गृह बनाने की तकनीक पर काम हो रहा है और बहुतेरे लोग अभी भी 'सजातीय-विजातीय' के मकड़जाल में उलझे ही हुए नहीं बल्कि उलझे रहना चाहते हैं । गोया वे मस्तिष्क विहीन कोई प्राणी है ।
सजातीय-विजातीयक्या है ?---
भोजन की थाली में रखी दाल में दाल न होकर भी नमक, घी, नींबू तो सजातीय हुए जबकि कंकड़, चीनी, बालू ये भी दाल न होकर विजातीय हुए ।
ऋषियों का कथन---
मनुष्य का जीवन आनन्द की देन है । इसलिए आनन्द सजातीय हुए । इस आनन्द की उपजातियां प्रेम, स्नेह, करुणा, दया, परोपकार हैं । जबकि विजातीय हैं क्रोध, नफरत, हिंसा, छीनाझपटी । जीवन की दाल में जब ये विजातीय पदार्थ आ जाते हैं तो जैसे दूध का विजातीय पदार्थ नींबू है, वैसे इन विजातीय भावों के आते आनन्द का श्वेत दूध फट जाता है ।
क्यों गठित हो रहे सजातीय संगठन?-
विगत दो-तीन दशकों से अनेक सजातीय संगठनों का उद्देश्य बदल ही नहीं गया, बल्कि भटक गया है । चुनाव आते ये सजातीय संगठन तेजी से मेढ़क प्रजाति की तरह आवाज करने लगते हैं ।
किसी सजातीय का भला किसी संगठन ने किया हो तो अपना काम तो बता दें । सिर्फ इसके कि राजनीति में जाति-विशेष की भागीदारी बढ़नी चाहिए ।
दो इंच जमीन के लिए लड़ते सगे भाई---
कचहरी में चल रहे जमीन के मुकदमे तथा इसी को लेकर फौजदारी के मुकदमों पर नजर डालें तो लगेगा कि जाति नहीं सगे भाई आपस में लड़ रहे है, पैसा और समय बर्बाद कर रहे हैं ।
सजाती यसंगठन इसे क्यों नहीं देखता ?---
दर असल मंचों पर बैठकर भाषण देने में मन (जो भी विशेषण लगा लें) को जिस तरह अपार आनन्द मिलता है, वह कचहरी जाकर और लड़ते भाइयों की जानकारी लेकर उनमें एकता कराने का प्रयास ज्यादा बोझिल भरा लगता है ।
चुनाव भी तो देखना है---
कभी त्रिस्तरीय पंचायत तो कभी सांसद और विधायक का चुनाव आता रहता है । जाति के नाम पर टिकट लेना और जाति-जाति चिल्लाकर वोट भी लेना है । कुछ को वोट का सौदागर भी बनना है तो फिर जगह जगह अस्तित्व में दिख रहे संगठन अमेरिकन घास की तरह खुजली पैदा तो करते ही रहेंगे ।
-सलिलपांडेय, मिर्जापुर ।
©लेखक की अनुमति के बिना नाम बदलकर प्रयोग करना कानूनन अवैध है ।
सजातीय-विजातीयक्या है ?---
भोजन की थाली में रखी दाल में दाल न होकर भी नमक, घी, नींबू तो सजातीय हुए जबकि कंकड़, चीनी, बालू ये भी दाल न होकर विजातीय हुए ।
ऋषियों का कथन---
मनुष्य का जीवन आनन्द की देन है । इसलिए आनन्द सजातीय हुए । इस आनन्द की उपजातियां प्रेम, स्नेह, करुणा, दया, परोपकार हैं । जबकि विजातीय हैं क्रोध, नफरत, हिंसा, छीनाझपटी । जीवन की दाल में जब ये विजातीय पदार्थ आ जाते हैं तो जैसे दूध का विजातीय पदार्थ नींबू है, वैसे इन विजातीय भावों के आते आनन्द का श्वेत दूध फट जाता है ।
क्यों गठित हो रहे सजातीय संगठन?-
विगत दो-तीन दशकों से अनेक सजातीय संगठनों का उद्देश्य बदल ही नहीं गया, बल्कि भटक गया है । चुनाव आते ये सजातीय संगठन तेजी से मेढ़क प्रजाति की तरह आवाज करने लगते हैं ।
किसी सजातीय का भला किसी संगठन ने किया हो तो अपना काम तो बता दें । सिर्फ इसके कि राजनीति में जाति-विशेष की भागीदारी बढ़नी चाहिए ।
दो इंच जमीन के लिए लड़ते सगे भाई---
कचहरी में चल रहे जमीन के मुकदमे तथा इसी को लेकर फौजदारी के मुकदमों पर नजर डालें तो लगेगा कि जाति नहीं सगे भाई आपस में लड़ रहे है, पैसा और समय बर्बाद कर रहे हैं ।
सजाती यसंगठन इसे क्यों नहीं देखता ?---
दर असल मंचों पर बैठकर भाषण देने में मन (जो भी विशेषण लगा लें) को जिस तरह अपार आनन्द मिलता है, वह कचहरी जाकर और लड़ते भाइयों की जानकारी लेकर उनमें एकता कराने का प्रयास ज्यादा बोझिल भरा लगता है ।
चुनाव भी तो देखना है---
कभी त्रिस्तरीय पंचायत तो कभी सांसद और विधायक का चुनाव आता रहता है । जाति के नाम पर टिकट लेना और जाति-जाति चिल्लाकर वोट भी लेना है । कुछ को वोट का सौदागर भी बनना है तो फिर जगह जगह अस्तित्व में दिख रहे संगठन अमेरिकन घास की तरह खुजली पैदा तो करते ही रहेंगे ।
-सलिलपांडेय, मिर्जापुर ।
©लेखक की अनुमति के बिना नाम बदलकर प्रयोग करना कानूनन अवैध है ।


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