नीति-वचन : आंख रहते हुए जो अंधे हैं! ।। Mirzapur news ।।

श्लोक-
अनेक संशय-उच्छेदि परोक्ष-अर्थस्य दर्शकम् ।
सर्वस्व लोचनं शास्त्रं न-अस्ति-अंध एव स: ।।
यौवनं धनसम्पत्ति: प्रभुत्वं-अविवेकता ।
एक-एकम्-अपि-अर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ।।
सलिल पांडेय
मिर्जापुर: अर्थ-धर्म और राजनीति, समाज और इतिहास सम्बन्धी उलझनों की धुंध के पार केवल ज्ञान की आंखों से देखा जा सकता है । ज्ञान तो एक ऐसा प्रकाश है जो संसार के हर अंधेरे को मिटा सकता है । जहां तक ज्ञान का प्रकाश पहुंच सकता है, वहां तक मानव की आंखें नहीं पहुंच सकती । जो नजर के सामने नहीं है, उसे देख सकने वाली आंखें महान हैं । जिसके पास ज्ञान की आंखें नहीं हैं, वे आंख रहते हुए भी अंधे हैं ।
          जिस प्राणी को यौवन, धन-दौलत, सत्ता तथा महानता में से कोई एक चीज मिल जाए वह अंधकार में अंधा होकर बड़े से बड़े पाप भी कर सकता है, और यदि किसी को ये चारों एक साथ मिल जाए, उस प्राणी का क्या हाल होगा ?

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