धर्मग्रन्थों का उद्घोष-पीड़ितों की मदद करना ही पुण्य है ।----
मिर्जापुर।
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् |
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||
अर्थ-महर्षि वेदव्यास जी ने पूरे अठारहो पुराण में दो बातें कही हैं। प्रथम-परोपकार करना पुण्य होता है और द्वितीय-पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना ।
मां विन्ध्यवासिनी परीक्षा ले रही---
मां विन्ध्यवासिनी की आस्था वाले क्षेत्र में प्रकृति ने इस श्लोक की परीक्षा लेने के लिए सम्भवतः कोई लीला की तथा ओला, चक्रवाती आंधी तूफान के जरिए हजारों हजार को भयानक कष्ट प्रदान कर दिया । बहुतों के घर उजड़ गए, अरमान उखड़ गए और भविष्य बिगड़ गए । एक पिता ने किशोर उम्र के बेटे को आश्वस्त किया था कि वह स्नातक की पढ़ाई करने जब घर से दूर शहर जाएगा तब जरूर स्कूटी दिला देंगे । उस बेटे की स्कूटी बेदर्द चक्रवाती तूफान ले उड़ा । यह एक ही बेटे की बात नहीं बल्कि बहुत से बेटों की कहानी है । फसल में ही उगता है बेटियों का सुहाग । अच्छी फसल तो धूम-धड़ाके से शादी वरना ससुराल में ताना भरी जिंदगी के लिए भी जीना पड़ सकता है ।
सरकारी मदद हमेशा नाकाफी होती है--
प्रकृति के आघातों के वक्त सिपाही-दरोगा और प्रशासन-विधायक व्यर्थ ही होते हैं । प्रशासन के पास सीमित संसाधन होते हैं और उसमें जोंक टाइप के भी घुसे रहते हैं तथा विधायक-सांसद की दृष्टि में पीड़ित एक वोटर होता है, सो आंसू बहाने पहुंचना ही है ।
जो मदद करता वह अपनी विपत्तियां टॉलता है---
पूरे धर्मग्रन्थों का सारांश यह है कि जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल-कुफल मिलता है । ऐसी स्थिति में उन लोगों को जो खुद को असहाय, अशक्त, अकिंचन, बेबस जैसी हीन-भावना का नहीं मानते हों, वे उठें तथा किसी भी इलाके में मदद के लिए हाथ बढ़ाएं ।
मदद के लिए हजार रास्ते---
मदद के लिए हजार रास्ते होते हैं। बशर्ते बस अपना मूल्यांकन (असेसमेंट) खुद व्यक्ति कमजोर तबके के रूप में न करे । जिनका घर ध्वस्त हो गया और पहनने तक के कपड़े बच्चों के पास नहीं बचे, पाठ्य-पुस्तक और कापियां आंधी ले उड़ी, घर में खाने का सामान क्रूर प्रकृति खा गई, इसमें से जिसके पास जो सामान हो, मदद के रूप में वह सामान दें। निश्चित रूप से दिखावे के लिए नहीं बल्कि आत्म संतोष के लिए किए गए इस सेवा से असीम सुख मिलेगा ।
सम्पर्क करें---
दुकानदार गांव से शहर में खरीददारी के लिए आने वालों से पीड़ित के बारे में पूछें, अधिकारियों से सम्पर्क करें या जिसे उचित समझते हों, उसे टेलीफोन, ह्वाट्सएप, फेस बुक या अन्य साइटों के जरिए सम्पर्क कर पीड़ितों की मदद में मुखर हों। टालें नहीं।
-सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
मिर्जापुर।
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् |
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||
अर्थ-महर्षि वेदव्यास जी ने पूरे अठारहो पुराण में दो बातें कही हैं। प्रथम-परोपकार करना पुण्य होता है और द्वितीय-पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना ।
मां विन्ध्यवासिनी परीक्षा ले रही---
मां विन्ध्यवासिनी की आस्था वाले क्षेत्र में प्रकृति ने इस श्लोक की परीक्षा लेने के लिए सम्भवतः कोई लीला की तथा ओला, चक्रवाती आंधी तूफान के जरिए हजारों हजार को भयानक कष्ट प्रदान कर दिया । बहुतों के घर उजड़ गए, अरमान उखड़ गए और भविष्य बिगड़ गए । एक पिता ने किशोर उम्र के बेटे को आश्वस्त किया था कि वह स्नातक की पढ़ाई करने जब घर से दूर शहर जाएगा तब जरूर स्कूटी दिला देंगे । उस बेटे की स्कूटी बेदर्द चक्रवाती तूफान ले उड़ा । यह एक ही बेटे की बात नहीं बल्कि बहुत से बेटों की कहानी है । फसल में ही उगता है बेटियों का सुहाग । अच्छी फसल तो धूम-धड़ाके से शादी वरना ससुराल में ताना भरी जिंदगी के लिए भी जीना पड़ सकता है ।
सरकारी मदद हमेशा नाकाफी होती है--
प्रकृति के आघातों के वक्त सिपाही-दरोगा और प्रशासन-विधायक व्यर्थ ही होते हैं । प्रशासन के पास सीमित संसाधन होते हैं और उसमें जोंक टाइप के भी घुसे रहते हैं तथा विधायक-सांसद की दृष्टि में पीड़ित एक वोटर होता है, सो आंसू बहाने पहुंचना ही है ।
जो मदद करता वह अपनी विपत्तियां टॉलता है---
पूरे धर्मग्रन्थों का सारांश यह है कि जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल-कुफल मिलता है । ऐसी स्थिति में उन लोगों को जो खुद को असहाय, अशक्त, अकिंचन, बेबस जैसी हीन-भावना का नहीं मानते हों, वे उठें तथा किसी भी इलाके में मदद के लिए हाथ बढ़ाएं ।
मदद के लिए हजार रास्ते---
मदद के लिए हजार रास्ते होते हैं। बशर्ते बस अपना मूल्यांकन (असेसमेंट) खुद व्यक्ति कमजोर तबके के रूप में न करे । जिनका घर ध्वस्त हो गया और पहनने तक के कपड़े बच्चों के पास नहीं बचे, पाठ्य-पुस्तक और कापियां आंधी ले उड़ी, घर में खाने का सामान क्रूर प्रकृति खा गई, इसमें से जिसके पास जो सामान हो, मदद के रूप में वह सामान दें। निश्चित रूप से दिखावे के लिए नहीं बल्कि आत्म संतोष के लिए किए गए इस सेवा से असीम सुख मिलेगा ।
सम्पर्क करें---
दुकानदार गांव से शहर में खरीददारी के लिए आने वालों से पीड़ित के बारे में पूछें, अधिकारियों से सम्पर्क करें या जिसे उचित समझते हों, उसे टेलीफोन, ह्वाट्सएप, फेस बुक या अन्य साइटों के जरिए सम्पर्क कर पीड़ितों की मदद में मुखर हों। टालें नहीं।
-सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।


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