जीवनदायिनी शक्ति का पर्याय हैं माता सीता

ऋषियों ने पृथ्वी को माता तथा आकाश को पिता माना है।
 सीधे अर्थों में देखा जाए तो जब आकाश से वर्षा की बून्दें पृथ्वी पर पड़ती हैं तो पृथ्वी से प्राण-तत्व के रूप में अन्न उत्पादित होता है । माता सीता जनक की पुत्री है । वैदिक ग्रन्थों में सीता कृषि की अधिष्ठात्री देवी और कई मंत्रों की देवता हैं । तैत्तरीय ब्राह्मण में सीता ही सावित्री और पाराशर गृहसूत्र में इन्द्रपत्नी कही गई है । इसलिए हमारे ऋषियों ने जीवनदायिनी शक्तियों को देवी देवता माना है ।
सूखे की समस्या को देखते जनक का कृषि-यज्ञ---
   भारत ही नहीं विश्व के अनेक देशों में चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के पुत्र मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और उनकी अर्धांगिनी माता सीता को साक्षात भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का अवतार मानकर पूजा की जाती है । जनमानस में अत्यंत प्रचलित गोस्वामी तुलसीदास के रामचरित मानस सहित अनेक अन्य रामायणों में धरती पर आदर्श की प्रतिमूर्ति माता सीता और भगवान श्री राम है । त्रेता युग मे मिथिला नरेश जनक की पुत्री के रूप में सीताजी का प्राकट्य उल्लिखित है । वास्तव में मिथिला में अवर्षण (सूखे) से घोर संकट को देखते हुए राजा सीरध्वज जनक ने यज्ञ के लिए जमीन जोती । आम जनमानस में सीताराम आराध्य देव हैं । लेकिन जनक द्वारा जमीन जोतने के वक्त हल का भूमि में स्थित घड़े से टकराने  तथा सीता के प्रकट होने के अर्थों को समझने से यह भ्रांति दूर हो जाएगी कि जमीन से कोई कन्या कैसे निकल सकती है ? सीरध्वज जनक के नामकरण में 'सीर' का अर्थ आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे उद्भट विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि हल और हल जोतने वाला बैल । इसके अलावा 'सीर' के मायने वह भूमि जिसे जमींदार स्वयं जोतता है तथा उपज को बांट देता है । 'सीता' का भी अर्थ होता है कृषि के लिए भूमि जोतते समय हल की नोंक से जो रेखा बनी । इस प्रकार सूखा, हल जोतना और सीता का प्रकट होना जनक कस कृषि क्रांति-यज्ञ ही है। आकाश पिता और  रत्नगर्भा धरती माता द्वारा जीवन देने को क्रमबद्ध ढंग से देखा जाए तो सीता और राम मानव ही नहीं हर प्रकार के जीवों के प्राणतत्व तथा प्रकृति संरक्षण के सूचक हैं । धरती एक भंडार है । इसमें कृषि के साथ जल, धातु तथा अन्यान्य पदार्थों का भंडारण है । 
भगवान श्री राम का अवतरण रावण जैसे ग्लोबल वार्मिंग को दूर करने के लिए हुआ-----
भगवान राम का धरती पर अवतरण भी जनक के कृषि क्रांति में हाथ बंटाने के लिए ही हुआ था । भगवान श्री राम का अहल्या उद्धार भी 'अ-हल्या' के रूप में लिया जाए तो जिस पाषाणवत भूमि में हल नहीं चल पा रहा था, उस भूमि में श्रीराम एक कृषि वैज्ञानिक के रूप में हल चलाकर शापित भूमि का उद्धार करते है । धरती और जीवन के विकास के लिए यही एक रास्ता था । जहां तक दैत्यों के संहार का प्रसंग है, वह कृषि को क्षति पहुंचाने वाले कीटाणुओं, जानवरों तथा प्रकृति विरुद्ध होने वाले कार्यों को रोकने तथा उसे नष्ट करने का उद्यम है । त्रेतायुग के इन सन्दर्भों को वर्तमान दौर के हालात से तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो ग्लोबल वार्मिंग से प्रकृति को होने वाली विश्व व्यापी चिंता से भी परिलक्षित होता है । रावण-बध कृषि संस्कृति को क्षति पहुंचाकर धरती को बंजर बनाने एवं उससे अनाज की जगह सिर्फ और सिर्फ भौतिक पदार्थों के अनियोजित दोहन के खिलाफ अभियान के रूप में देखा जाना चाहिए । सीता जी के विवाह के समय शिव का धुनुष टूटना भी निरस्त्रीकरण का भाव है । वरना जनक ने शिव धनुष तोड़ने की बात नहीं कही थी, बल्कि उसे संसाधने के लिए कहा था । जब श्रीराम ने देखा कि यह धनुष (उस वक्त का परमाणु बम) गलत हाथों में चला जाएगा तो धरती से जीवन तो नष्ट होगा ही, साथ में जनक के भूमि-यज्ञ की मंशा पर पानी फिर जाएगा तो श्रीराम ने वैज्ञानिक विधि से उसको नष्ट किया । धनुष जब टूटा था तो बड़ा भारी कोलाहल हुआ, वायुमण्डल की प्रकृति बदल गई ।  परमाणु बम समर्थक परशुराम दौड़ आए लेकिन श्रीराम की मंशा जानकर उन्हें विष्णु रूप माना । भगवान राम का वन की ओर जाना भी प्रकृति संरक्षण के तहत वन-उपवन, झील, सरोवर, पशु-पक्षी, हल न चलने योग्य भूमि को उर्वर और जीवंत बनाने तथा कृषि सँस्कृति को बढ़ावा देने से सम्बन्ध रखता है । माता सीता भूमि से प्रकट होने के कारण भूमिजा कहलाई । चाहे अयोध्या की भूमि और प्राकृतिक संरक्षण की बात हो या लंका की । धरती पर प्रकृति विरोधी कार्यों का असर पूरे 'क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर' सब पर अंततः पड़ता है । द्वापर में भी राधा और कृष्ण के रूप में सीता एवं श्रीराम का अवतरण पर्यावरण की रक्षा के लिए ही हुआ । सीता फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को प्रकट होती हैं तो श्रीराम अगले माह चैत्र के शुक्लपक्ष की नवमी में प्रकट होते है । पर्यावरण के अंधेरापक्ष को दूर कर शुक्ल पक्ष के उजाले के रूप में इसे देखा जाना चाहिए ।
सीता-राम का विवाह कृषि सम्पन्नता का सूचक---
इसके साथ ही  सीताजी का विवाह श्रीराम से मार्गशीर्ष महीने के शुक्लपक्ष में (पंचमी तिथि) रबी की फसल की जुताई-बुआई के  अवसर पर हुआ तो श्रीराम का जन्म रबी की कटाई के समय चैत्र में हुआ । सीता-विवाह यज्ञ को राजा-जनक की मंशा पृथ्वी पर कृषि सम्पन्नता बढ़ाने के लिए पूर्ण कृषि-वैज्ञानिक की तलाश के रूप में परिलक्षित होता है । इस नजरिए से श्रीराम द्वारा सीता का त्याग सीरध्वज राजा जनक के उस भाव को पुष्ट करता है कि जमींदार को चाहिए कि उत्पादित अनाज को जरूरतमंद में वितरित कर जीवन-रक्षा करना ही देवत्व कार्य है । वाल्मीकि का आश्रम वह केंद्र विन्दु है, जहां से आश्रम में आने वालों को जरूरत के हिसाब से पदार्थ दिया जाए क्योंकि पहले जीवन होगा तब ज्ञान और उसके जरिए विकास सोचना सार्थक हो सकेगा । धर्मस्थल का मतलब लोकसेवा केंद्र के रूप में ही उचित होता है ।
                      -सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
© कॉपीराइट/दैनिक जागरण में 11 फरवरी '20 को प्रकाशित आलेख का विस्तृत रूप

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