निर्भया के गुनहगारों को फांसी

फांसी पर टँग गए कहलाएंगे टेंगर
दहले कि नहीं अपने माननीय बापू, अकबर और सेंगर ?-
मिर्जापुर । बहुचर्चित एवं न्याय के लिए बहुलंबित निर्भया के गुनहगारों को कानूनी फांसी पर चढ़ाए जाने के बाद कोरोना के विश्वव्यापी प्राकृतिक फांसी से बचने की कोशिश में लगे दौर में दीवाली और होली जैसा उमंग दिख रहा है । चहुओर ताली बज रही है।  घण्टा-घड़ियाल बज रहे है । हालांकि इसके लिस 22 मार्च की संध्या वेला शाम 5 बजे का समय मुकर्रर हुआ है । लेकिन 20 मार्च की संधि वेला प्रातः 5.30 से खुशी के नगाड़े संचार माध्यमों से बजते सुनाई पड़ने लगे । 
रात जा रही थी और दिन हो रहा था--
सुबह की वेला भी संधि वेला है । रात जा रही थी दिन हो रहा था । यानि नारी-चीत्कार के अंधेरे का अस्तित्व समाप्त हो रहा था और नारी मर्यादा तथा सम्मान का प्रकाश हो रहा था ।
गृहस्थों की एकादशी और साधु संतों की एकादशी की भी संधि वेला थी---
19 मार्च को गृहस्थों की एकादशी तिथि थी तो 20 मार्च साधु-संतों की एकादशी । एकादशी सूचक भी है एक नारी और एक पुरुष के साथ चलने की तिथि । एक एक ग्यारह का भाव न कि 2 का भाव ।
निर्भया-कांड पर उद्वेलित हुआ था समाज---
जिस वक्त निर्भया के साथ हादसा हुआ था तो देश डरा-सहमा नहीं बल्कि उद्वेलित हुआ था । डरी-सहमी थी तो सिर्फ नारियां। उस घटना के बाद यह प्रतीत हुआ था कि अब 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते..' का उद्घोष पूरी तरह साकार होगा लेकन यह क्या ? लाइन लग गई नारी-सम्मान पर डाका डालने की   । होड़ लग गई जैसे कोई प्रतियोगिता हो रही है और जो जितना आगे रहेगा, उसको उतना बड़ा ओहदा मिलेगा !
किस किस का नाम लूँ मैं---
सभी जानते हैं उस घटना के बाद के रावण से भी विभत्स 'महानुभावों' को । कौन लायक और कौन नालायक इसका खुलासा 'मी-टू' अभियान से तो हुआ ही, इसके अलावा भी कौन सा तबका नहीं हुआ कलंकित ? मंत्री-विधायक, साधु-संत और महाराज जिन्हें दुनियां महानायक मानती थी, वे कानून की नजर में 'क्रूरतम खलनायक' बन के उभरे । किस किस का नाम लूँ । नाम गिनाएंगे तो 'खलनायक पुराण' बन जाएगा ।
कोई नहीं कहता कि मेरे परिवार के खलनायक को भी फांसी दो--
विचित्र चिंतन है मानव का । अपने परिवार का सदस्य खलनायकी करे तो उसका बचाव । लड़की/महिला पर चरित्रहीनता का आरोप और अपने परिवार की महिला के साथ हादसा हो तो फांसी की मांग ? फांसी पर ताली बजाने का यह स्वांग भी कहा जा सकता है । कहीं कोई नहीं कहता है कि भले ये अपने हैं, अपनी पार्टी, अपने गोल-गुट के, इन्होंने गलती की तो इन्हें भी टांगों शूली पर । 
चैत्र महीना चित्त शुभ संकल्पों वाला हो---
इस स्थिति में निर्भया के दोषियों को फांसी पर इतराने से ज्यादा संकल्प लेने का है । चैत्र महीने की इस शुभ तिथि एकादशी पर हर कोई शपथ ले कि नारी दुर्गा है,लक्ष्मी है, सरस्वती है और अपने से ज्यादा सम्मान करना है उसका । जरूरत पड़े तो देकर उसकी मर्यादा बचानी है।  चित्त द्वंदात्मक नहीं बल्कि शुभ संकल्पों का रखना होगा ।
                      -सलिल पांडेय, मिर्जापुर ।
©लेखन चोरी कॉपीराइट एक्ट के तहत दण्डनीय है ।

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