होली: कौआ कान ले गया और हम भाग रहे कौए की ओर!

मिर्जापुर । कहने को तो यह ज्ञान-युग है और गूगल (गगन ही कहें) तो हर पल ज्ञान की वर्षा हो रही है लेकिन यह वर्षा अतिवृष्टि की तरह हो गई है । अतिवृष्टि के खिलाफ ही योगेश्वर श्रीकृष्ण ने महा-आंदोलन चलाया था तथा गोकुलवासियों को एकजुट कर गोवर्धन पर्वत कनिष्ठिका उंगली पर उठा लिया था ।
होली की पूर्व संध्या होलिका के नाम---
किसी ने गूगल में अपलोड कर दिया कि होलिका में घी में डुबोकर, लौंग-इलायची, कर्पूर तथा और भी सारे पदार्थ डालने से भाग्य के दरवाजे जो अलीगढ़ी ताले में बंद है स्वतः खुल जाएंगे ।
नहीं खुले अलीगढ़ी ताले तो क्या होगा ?--
लौंगा-इलायची घी में डुबोकर होलिका में डालने से सम्पन्नता आती है तो फिर कड़ी मेहनत की जरूरत ही क्या ? यदि मेहनत से सम्पन्नता आती है तो टोटके की जरूरत क्या ? 
अंधानुकरण 
किसी ने दुकानदारी चलाने के लिए लिख दिया तो सब भेड़चाल में लग गए । हाई लाइट होने के लिए किसी ने गूगल में तरह तरह का टोटका अपलोड कर दिया तो पका-पकाया भोजन की तरह जिसे देखिए वही टोटके को रट और लिख रहा है। 
यह तो कामचोरी है ।---
व्यापारिक कम्पनियों ने टोटकों के लिए ज्ञानी-ध्यानी खरीद लिया है।  कर्पूर केमिकल से बन रहा है।  हजार रुपए किलो में बिक रहा है। इन टोटकों के प्रचार से कम्पनियों को तो लाभ होगा पर जलाने वाले को कोई गारंटी नहीं दे रहा है कि यदि उसे नहीं लाभ हुआ तो उसकी भरपाई कौन करेगा ?
बहराल नकारात्मक प्रवृत्तियों की जले होली--
जब नकारात्मकता जल कर भस्म हो जाए तो इस खुशी में कि व्यक्ति सकारात्मक हो गया, भस्म लगाना तो सार्थक है पर सिर्फ भस्म लगा लेने से कुछ होने वाला नहीं  है।
                      -सलिल पाण्डेय, मिर्जापुर ।
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तिवराने टोला में टायर-ट्यूब रहित होलिका सजाते प्रबुद्धजन ।

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